अध्याय 19: राजस्थान के लोक नाट्य (Drama)
राजस्थान कला एवं संस्कृति
परिभाषा: रंगमंच पर लोगों का मनोरंजन करने के लिए जो कार्यक्रम दिखाया जाता है, उसे लोकनाट्य कहते हैं।
जनक व निर्देशक: राजस्थानी नाटकों के जनक व निर्देशक कन्हैयालाल पंवार थे।
जनक व निर्देशक: राजस्थानी नाटकों के जनक व निर्देशक कन्हैयालाल पंवार थे।
1. तमाशा
- मूल स्थान & प्रसिद्धि: मूलतः महाराष्ट्र का नाट्य; राजस्थान में जयपुर का प्रसिद्ध है।
- प्रारंभ: सवाई प्रताप सिंह (1778-1803 ई.) के समय हुआ। जयपुर में बंशीधर भट्ट इसके प्रमुख कलाकार थे।
- विशेषता: यह खुले मंच पर किया जाता है जिसे 'अखाड़ा' कहते हैं। इसमें स्त्री पात्र की भूमिका स्त्रियाँ ही निभाती हैं। नाट्य, संगीत, नृत्य व गायन का मिश्रण होता है।
- प्रमुख कलाकार: गोपीकृष्ण भट्ट, ब्रजपाल, वासुदेव भट्ट, गौहरजान। उस्ताद परंपरा फूलजी भट्ट ने प्रारंभ की थी।
- प्रसिद्ध तमाशे: हीर-रांझा (धुलंडी के दिन), भर्तृहरि, जोगी-जोगन (होली), छैला पणिहारी, गोपीचन्द (चैत्र अमावस्या), जूठन मियाँ (शीतला अष्टमी), रूपचंद गढ़ी, नानकशाही तमाशा।
2. रम्मत
- उद्भव व स्थान: जैसलमेर में उद्भव; बीकानेर की आचार्यों की चौंक की रम्मत प्रसिद्ध है। (रात्रि में पुष्करणा ब्राह्मणों द्वारा होली व सावन माह में मंचन)।
- विशेषता: खेलने वाले 'खेलार/रम्मतिये' कहलाते हैं। नगाड़ा व ढोलक मुख्य वाद्य यंत्र हैं।
- स्वतंत्र बावनी: जैसलमेर के तेज कवि ने 1943 में 'स्वतंत्र बावनी' रचना गांधीजी को भेंट की थी।
- प्रमुख रम्मतें:
- अमरसिंह री रम्मत: आचार्यों के चौक में की जाती है (श्रृंगार व सौंदर्य की प्रधानता)।
- हड़ाऊ मेरी री रम्मत: जवाहरलाल जी पुरोहित द्वारा प्रारंभ; कुंभलगढ़ के राजा हड़ाऊ व पत्नी मेरी का वर्णन।
- जमनादास री रम्मत: रसिकलालदेव जी द्वारा रचित, फाल्गुन माह में व्यास जी के चौक में।
- फक्कड़ दातार री रम्मत: बीकानेर की प्रसिद्ध (बीरा-बीर हास्य, गणेश वंदना)।
- फागू महाराज री रम्मत: फाल्गुन माह में भट्टों के चौक में (लावणियाँ प्रसिद्ध)।
- मनीराम जी की रम्मत: व्यासों के चौक में की जाती है।
- कन्हैयालाल की रम्मत: व्यासों के चौक में।
- राजिया महाराज की रम्मत: फाल्गुन में दर्जी के चौक में।
3. गवरी / राई नाट्य (सबसे प्राचीन)
- परिचय: मेवाड़ में भीलों द्वारा किया जाने वाला राजस्थान का सबसे प्राचीन मेरुनाट्य है। यह सबसे लंबा (40 दिन) चलने वाला नाट्य है (भाद्रपद कृष्ण एकम से)।
- कथा: शिव, पार्वती व भस्मासुर की कथा पर आधारित। शिवजी 'पुरिया' कहलाते हैं।
- प्रमुख पात्र (5): बूढ़िया, राई, झामटिया, कुटकुड़िया, भोपा। (झामटिया लोक भाषा में कविता बोलता है और खटखड़या उसे दोहराता है)।
- गवरी री घाई: गवरी के विभिन्न प्रसंगों को आपस में जोड़ने वाला सामूहिक नृत्य।
- 11 लघु नाटिकाएँ:
- माता व नाहर (दर्शकों को आशीर्वाद)
- भंवरा-भंवरी (देवर-भाभी संवाद)
- मियावड़ (भस्मासुर द्वारा पार्वती को प्राप्त करने का प्रयास)
- बाबा (भस्मासुर की कथा)
- कान्ह-गूजरी (जादू-टोने व तांत्रिक प्रयोग)
- अम्बाव तथा कालू कीर (अंगूठी मछली के पेट से निकालना)
- देवी-अम्बाव
- खांडलिया भूत
- बादशाह की सवारी
- घड़ावत (मिट्टी का हाथी बनाकर विसर्जन)
- वलावण (अंतिम नाटिका - जल विसर्जन)
4. भवाई नाट्य
- मूल: गुजरात का नाट्य, मेवाड़ में भवाई जाति द्वारा किया जाता है।
- जनक: बागाजी / नागाजी जाट (केकड़ी, अजमेर)।
- प्रकृति: यह व्यावसायिक नाट्य है। इसमें उच्च वर्ग व निम्न वर्ग के संघर्ष को दिखाया जाता है।
- विशेषता: सिर पर अनेक मटके रखकर, तलवार पर, थाली पर, गिलास पर कांच पर नृत्य।
- प्रसिद्ध रचना: शांता गांधी की 'जस्मा ओडन'।
5. स्वांग (बहुरुपिया)
- परिचय: होली पर विभिन्न प्रकार के स्वांग रचकर मनोरंजन करना (हास्य कला प्रधान)। मारवाड़ी में रावल जाति द्वारा।
- प्रसिद्ध केंद्र & कलाकार: भीलवाड़ा का प्रसिद्ध। जानकीलाल भांड (मंकी मैन - लंडन में कला दिखाई) एवं परशुराम प्रसिद्ध कलाकार हैं।
- नाहरों का स्वांग: मांडल (भीलवाड़ा) में चैत्र कृष्ण त्रयोदशी को (शाहजहाँ के समय 1614 ई. से शुरू)।
6. नौटंकी एवं चारबैत
नौटंकी
- स्थान: भरतपुर, करौली, सवाई माधोपुर व धौलपुर। (हाथरस शैली की प्रसिद्ध)।
- वाद्य यंत्र: 9 प्रकार के वाद्य यंत्र काम में लिए जाते हैं।
- प्रवर्तक: हाथरस के नत्था राम शर्मा। राजस्थान में डीग के भूरीलाल जनक हैं।
- पुरस्कार: रामदयाल शर्मा को 2021 में पद्मश्री मिला (ब्रज कोकिला नाम से विख्यात)।
चारबैत
- स्थान: टोंक (नवाबों की विद्या/पठानी शैली)।
- वाद्य यंत्र: डफ वाद्य यंत्र के साथ कव्वाली के रूप में गायन।
- प्रारंभ: नवाब फैजुल्ला खान के समय करीम खान निहंग ने प्रारंभ किया।
7. लीला नाट्य (रासलीला, रामलीला आदि)
- रासलीला: ब्रजप्रदेश की राई जाति द्वारा व्यावसायिक रूप। मुख्य नायक 'स्वरूप' कहलाता है। राजस्थान में प्रवर्तक वल्लभ संप्रदाय (हरिवंश)। फूलेरा (जयपुर) की प्रसिद्ध।
- रामलीला: गोस्वामी तुलसीदास ने काशी से प्रारंभ की।
- बिसाऊ (झुंझुनूं): मूक अभिनय (मूक रामलीला)।
- अटरू (बारां): धनुष राम द्वारा नहीं बल्कि दर्शकों द्वारा तोड़ा जाता है।
- पाटोदा/मांगरोल: ढाई कड़ी के दोहों की रामलीला।
- अन्य लीलाएँ: सनकादिकों की लीला (घोसुंडा व बस्सी), नृसिंह लीला (जोधपुर का मुल्कों का मेला), गौर लीला (आबू रोड में गरासिया जाति द्वारा)।
8. प्रमुख ख्याल
कुचामनी ख्याल
नागौर। जनक: लच्छीराम। ओपेरा शैली जैसा, केवल पुरुष पात्र।
तुर्रा-कलंगी ख्यालउद्भव: चंदेरी (MP)। शाहअली (कलंगी-पार्वती) व तुकनगीर (तुर्रा-शिव)। चंग वाद्य यंत्र। घोसुंडा, निम्बाहेड़ा प्रसिद्ध।
शेखावाटी ख्यालचिड़ावा। जनक: नानुराम राणा, प्रसिद्ध कलाकार: दुलिया राणा।
जयपुरी ख्याल
स्त्री पात्र की भूमिका स्त्रियाँ ही निभाती हैं। इसमें रुढ़िवादिता नहीं है।
हेला ख्याललालसोट (दौसा) व सवाई माधोपुर। जनक: हेला शायर। नौबत वाद्य यंत्र का प्रयोग।
अलीबक्षी ख्यालमुंडावर (खैरथल तिजारा)। जनक: नवाब राव अलीबख्श (अहीरवाटी)।
कन्हैया ख्याल
सवाई माधोपुर, करौली, भरतपुर। मुख्य पात्र 'मेडिया' कहलाता है। मंजीरा व नौबत का प्रयोग।
कठपुतली ख्यालनट या भाट जाति द्वारा। अरडू (काष्ठ) की कठपुतलियाँ।
माच के ख्यालभीलवाड़ा। जन्मदाता: बगसू राम। वीर रस व भक्ति पर आधारित।
9. प्रमुख दंगल एवं लोक उत्सव
- रसिया दंगल: डीग (भरतपुर) का प्रसिद्ध।
- कन्हैया दंगल: करौली का प्रसिद्ध (रामायण-महाभारत प्रसंग)।
- कादरा भूतरा दंगल: गीजगढ़ (सीकर/दौसा) का प्रसिद्ध।
- भेंट दंगल: बाड़ी-बसेड़ी (धौलपुर)।
- सांगोद का न्हाण: कोटा (9वीं सदी से वीरवर सांगा गुर्जर की याद में)।
- हुरंगा नाट्य: भरतपुर में होली पर (स्त्री-पुरुष बम/ढोल पर नाचते हैं)।
10. भारत के प्रमुख लोकनाट्य
- दशावतार: गोवा, कोंकण (लकड़ी का मास्क पहनकर विष्णु के 10 अवतार)।
- भांड पाथेर: कश्मीर (किसानों द्वारा)।
- गरोबा: गुजरात (रोमांस व वीरता प्रस्तुतीकरण)।
- अंकिया नाट: असम, ओडिशा, बंगाल (शंकरदेव व शिष्य महादेव द्वारा प्रारंभ)।
- जात्रा: बंगाल (चैतन्य महाप्रभु द्वारा प्रारंभ धार्मिक अनुष्ठान)।