राजस्थान के वस्त्र - पुरुषों एवं महिलाओं के परिधान

राजस्थान के वस्त्र एवं परिधान

राजस्थान कला एवं संस्कृति | संपूर्ण हस्तलिखित/प्रिंटेड नोट्स का सार

विशेष नोट: कोट-पैंट जोधपुर का भारत की राष्ट्रीय पोशाक है। पगड़ी को संरक्षण मुगल शासक अकबर (1556-1605 ई.) ने दिया था। राजस्थान में पगड़ी प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती है।

1. पुरुषों के प्रमुख वस्त्र

पगड़ी एवं साफा
  • अन्य नाम: पाग, पेचा, साफा, फालियों, घुमालो, फेंटो, सेलो, लपेटो, शिरोत्राण, अमलो, बागा, उष्णीय।
  • रतनपेच: पगड़ी पर लगाया जाने वाला विशेष आभूषण।
  • बालाबन्द: पगड़ी पर लगाया जाने वाला जरीदार वस्त्र।
  • उपरणी: पगड़ी पर लगाया जाने वाला वस्त्र।
  • छाबदार: मेवाड़ में पगड़ी बांधने वाले व्यक्ति को कहते हैं।
  • पोटिया: आदिवासियों द्वारा पगड़ी के स्थान पर बांधा जाने वाला वस्त्र।
शरीर के ऊपरी अंग के वस्त्र
  • जामा: घुटनों तक पहना जाने वाला वस्त्र (अकबर ने इसे 'सर्वगाति' तथा अबुल फजल ने 'टकुचिया' कहा)।
  • चोगा: अंगरखी के ऊपर पहना जाने वाला गौन जैसा वस्त्र (सवाई माधो सिंह का चोगा सिटी पैलेस जयपुर में प्रदर्शित है)।
  • अंगरखी/बुगतरी: कमर से ऊपर का वस्त्र, जिसे मिरजाई, कानो, डगला, डोडी, गदर, तनसुख, दुताई भी कहते हैं।
  • अचकन: अंगरखी का संशोधित रूप (बिना कॉलर का कुर्ता)।
  • आत्मसुख: सर्दी से बचने के लिए चोगे के ऊपर ओढ़ा जाने वाला गर्म कपड़ा/रुई का वस्त्र।
  • कमरबन्ध/पटका: जामा के ऊपर कमर पर बाँधा जाने वाला वस्त्र जिसमें तलवार या कटार रखी जाती है।
शरीर के निचले अंग के वस्त्र
  • ब्रिजेस/रिजस: चूड़ीदार पाजामे की तरह मोटे कपड़े का वस्त्र, जो घुटनों से ऊपर चौड़ा व नीचे तंग होता है (शिकार/पोलो खेल के समय राजपूत पुरुषों द्वारा प्रयुक्त)।
  • धोती: कमर से घुटनों तक (लंबाई 4 मीटर, चौड़ाई 90 सेमी.)। सहरिया जनजाति में 'पंछा' व भीलों में तंग धोती 'ढेपाड़ा' कहलाती है।
  • खोयतू: भीलों में कमर पर बांधी जाने वाली लंगोटी।
  • पाजामा/सूथन: कमर से पैरों तक का ढीला वस्त्र।
ऋतु व अवसर अनुसार पगड़ियाँ
  • श्रावण (तीज): लहरिया पगड़ी
  • दशहरा: मदील (जरी की पगड़ी)
  • विवाह: मोठड़े की पगड़ी
  • होली: फूल-पत्तियों वाली पगड़ी
  • युद्ध/गर्मी: केसरिया पगड़ी
  • शोक: सफेद पगड़ी

2. रियासतकालीन पगड़ियों के प्रकार

पगड़ी का नाम स्थान / रियासत
अमरशाही / राजशाही / मानशाहीजयपुर
उदावतशाही / जसवंतशाहीजोधपुर
हमींरशाही पगड़ीबनेड़ा (भीलवाड़ा)
मांडपशाही पगड़ीकानोड़ (उदयपुर)
राठौड़ी पगड़ीबदनौर (ब्यावर)
जसवंतशाही पगड़ीदेवगढ़ (राजसमंद)
चूड़ावतशाही पगड़ीसलूम्बर
मानशाही पगड़ीभैंसरोड़गढ़ (चित्तौड़गढ़)

3. महिलाओं के प्रमुख वस्त्र एवं ओढ़नियाँ

प्रसिद्ध साड़ियाँ
  • कोटा डोरिया (मसूड़िया): कैथून (कोटा) व मांगरोल (बारां) की प्रसिद्ध (राजस्थान की बनारसी साड़ी)।
  • सूट की साड़ी: सवाई माधोपुर की प्रसिद्ध।
  • फूल पत्तियों की साड़ी: जोबनेर (जयपुर)।
  • जामशाही साड़ी: विवाह के समय पहनी जाने वाली साड़ी।
  • चूबा-चंदन व स्प्रे प्रिंट साड़ियाँ: नाथद्वारा (राजसमंद)।
  • जनेब की साड़ियाँ: कंसुआ (कोटा)।
पोमचा एवं ओढ़नी के प्रकार
  • पीला पोमचा: पुत्र जन्म पर प्रसूति द्वारा ओढ़ा जाता है (वंशवृद्धि का प्रतीक)।
  • गुलाबी पोमचा: पुत्री जन्म पर ओढ़ा जाता है।
  • चीड़ का पोमचा: विधवा महिलाओं द्वारा ओढ़ी जाने वाली काले रंग की ओढ़नी (कोटा की प्रसिद्ध)।
  • ताराभांत / केरीभांत / ज्वारभांत / लहरभांत: आदिवासी महिलाओं की प्रमुख ओढ़नियाँ।
  • डांगरशाही ओढ़नी: जोधपुर की प्रसिद्ध।
  • चांदकली / अवोचण: महिलाओं के सिर पर ओढ़ने के बहुमूल्य वस्त्र।
घाघरा, कंचली व अन्य परिधान
  • कछाबू: भील महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला घाघरा।
  • नांदणा/नांदणा: नीले रंग का घाघरा जो आदिवासियों में प्रचलित है।
  • कुर्ती-कांचली: कमर के ऊपर पहने जाने वाले वस्त्र (कांचली में बाजू होती है)।
  • तिलका: मुस्लिम महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला सफेद/रंगीन चोगा।
  • लुगड़ा: लछमनगढ़ (सीकर) व मुकंदगढ़ (झुंझुनूं) का प्रसिद्ध।
  • दामणी: मारवाड़ में प्रसिद्ध लाल रंग की ओढ़नी जिस पर जरी का काम होता है।
आदिवासी महिलाओं के विशेष वस्त्र
  • फड़का: कथौड़ी महिला द्वारा मराठी अंदाज में पहनी जाने वाली साड़ी।
  • रेजा: सहरिया स्त्री का विवाह वस्त्र।
  • खूसनी: कंजर विवाहित महिला का कमर वस्त्र।
  • चक्का सेवरा: कालबेलिया जाति की महिला का वस्त्र।
  • पीरिया: भील दुल्हन का पीला घाघरा।
  • जामसाई: विवाह के अवसर पर ओढ़ी जाने वाली ओढ़नी।
राजस्थान के आभूषण (Ornaments of Rajasthan)

राजस्थान के प्रमुख आभूषण

राजस्थान कला एवं संस्कृति | सिर से लेकर पैर तक के संपूर्ण आभूषण

सामान्य परिचय एवं पुरातात्विक साक्ष्य:
• राजस्थान में आभूषण को गहना या जेवर भी कहा जाता है।
कालीबंगा (हनुमानगढ़): काली चूड़ियाँ प्राप्त हुईं।
चन्दहूड़ो: मनके बनाने का कारखाना मिला।
रंगमहल: पत्थर-काँच व हड्डी के आभूषण प्राप्त हुए।

1. सिर व मस्तक के आभूषण

मस्तक एवं ललाट के आभूषण
  • शीशफूल: सोने की बनी सांकल जिस पर फूल के चित्र बने होते हैं।
  • रखड़ी: मांग के आगे के भाग में पहनी जाती है (इसके पीछे लगा सोने का हुक 'बगड़ी' कहलाता है)।
  • धपड़ी: रखड़ी के नीचे माथे के दोनों ओर तीन-चार इंच चौड़ा पत्री।
  • झाला: सोने-चांदी की लड़ियाँ जो कानों के पास बालों में लगाई जाती हैं।
  • बोरला: बेर के आकार में बना सोने का आभूषण जिसके पीछे हुक व धागा होता है।
  • टीका/टीका/तिलक: सोने से बना हुआ फूल जिस पर डायमण्ड लगे होते हैं।
मांग एवं मस्तक के अन्य आभूषण
  • बिंदी/बिंदी: सुहागिन स्त्रियों द्वारा माथे के बीचों-बीच लगाई जाती है।
  • मोड़: शादी के समय दूल्हे/दुल्हन के सिर पर बांधा जाता है।
  • मैमन्द: महिलाओं द्वारा माथे पर पहना जाता है।
  • टिड्डी-भलकों: महिलाओं द्वारा मांग भरने के स्थान से थोड़ा नीचे पहना जाता है।
  • सिरमांग: मांग भरने की जगह गोल तिल्ली आकार का आभूषण।
  • चूड़ारत्न / चूड़ामणि: कुवलयमाला में उल्लिखित सिर का प्रमुख आभूषण।
  • अन्य: ताविद, मांगटीका, फिणी, गेड़ी, काचर, सांकली, मौरमींडली, सिरपेच, सुवालको।

2. कान एवं नाक के आभूषण

कान के आभूषण
  • झुमकी / झुमका: सोने-चांदी से बना आभूषण जिसके नीचे घुँघरू लगे होते हैं।
  • टोपस / कर्णफूल: कानों में लटकाया जाने वाला उल्टे गोल पिंजरे के समान आभूषण।
  • पीपल पत्र: पीपल के पत्ते के समान बना आभूषण जो कानों के ऊपरी हिस्से में पहना जाता है।
  • झोला: गरासिया महिलाओं का प्रिय आभूषण जो कानों में लटकन की तरह होता है।
  • लंग: नाक व कान दोनों में पहना जाता है (प्राथमिकता कान)।
  • अन्य कान के आभूषण: चोप, चुनी, बारी, कुड़कली, बाली, कोकरू, छैलकड़ी, झाल, दुरंगली, तड़को, पासी, ओगणिया, एरंगपत्ते आदि।
नाक के आभूषण
  • नथ: बाईं नाक में पहनी जाती है; इसमें मोर-मोरनी की आकृति होती है।
  • बेसरी: इसमें भी नाचते मोर की आकृति होती है (बणी-ठणी चित्र में प्रेयसी को पहनाई गई है)।
  • लूंग: सोने/चांदी का बना आभूषण जिसमें नग लगा होता है (बिना नग का 'कांटा' कहलाता है)।
  • चोंप: नाक में पहना जाने वाला आभूषण (ध्यान दें: 'चूँप' दाँत का आभूषण है)।
  • भंवरा: बड़ी आकृति में बना लौंग जो विश्नोई समाज की महिलाएँ पहनती हैं।
  • अन्य: कांटा, चुनी, लटकन, बलनी, कोकॉ, खीवण, नथड़ी, कड़क।

3. दाँत एवं गले के आभूषण

दाँत के आभूषण
  • चूँप: दाँत को खोदकर उसमें सोने की जड़ाई की जाती है।
  • रखन: दाँत पर सोने या चाँदी का कवर।
  • धांस: दाँतों पर लगाई गई सजावटी ग्रिल।
  • मेख: सोने की कील जो दाँत में जड़ी जाती है।
गले के आभूषण
  • बजंटी: सोने के मोतियों को कपड़े पर सिलकर बीच में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ लगाई जाती हैं।
  • हाँसली / खूँगाली: सोने-चांदी से बना चौकोर तथा किनारों पर पतला आभूषण।
  • झालरा: सोने-चांदी का आभूषण जिसमें घुँघरू बने होते हैं।
  • आड़: चौफेरे के बाद ननिहाल पक्ष द्वारा दुल्हन को पहनाया जाने वाला आभूषण।
  • मंगलसूत्र / कण्ठी / मांदलिया: सुहाग का प्रतीक एवं गले में पहनने योग्य आभूषण।
  • अन्य: हार, चंद्रहार, गलपट्टा, थमण्यो, चम्पाकली, तिमणियाँ, पोत, हंसहार, सरी, जंजीर, पंचलड़ी।

4. बाजू, कलाई, हाथ व कमर के आभूषण

बाजू एवं कलाई (हाथ)
  • भुजबन्द / बाजूबन्द: फूल पत्तियों से बनी सांकल व रेशमी फुंदों से युक्त आभूषण।
  • टड्डा: तांबे की छड़ पर सोने का रंग चढ़ाकर बनाया गया बाजू आभूषण।
  • बल्लैया: हाथी दाँत या रबड़ की चूड़ियाँ।
  • गोखरू: तिकोने दानों वाला चूड़ा जो कलाई पर पहना जाता है।
  • हथपान / सोवनपान: पाँचों अंगलियों व कलाई से जुड़ा आभूषण (शादी में दुल्हन को पहनाया जाता है)।
  • अंगुथलो / मुद्रिका / अरसी: अंगूठे व अंगलियों में पहनी जाने वाली अँगूठी।
कमर के आभूषण
  • कणकती / कन्दोरा: सोने या चाँदी का आभूषण जिसमें चेन लटकी रहती है।
  • तगड़ी: चाँदी का बना आभूषण जो कमर में पहना जाता है (इसमें घुँघरू लगे होते हैं)।
  • चौथ: पुरुषों द्वारा पहना जाने वाला चाँदी का चौकोर जालीदार आभूषण।
  • सटका: घाघरे के नेफे (नाड़ा) में लटकाया जाने वाला सोने-चांदी का आभूषण।
  • अन्य: कड़धौड़ी, मेखला, कमरबंद, वसन, करधनी, जंजीर।

5. पैर, पैर की अंगुली एवं पुरुषों व बच्चों के आभूषण

पैर व पैर की अंगुली के आभूषण
  • आँवल: लहरदार कड़ा।
  • तोड़ा / लंगर: रस्सी की तरह गूँथ कर बनाया गया चाँदी का आभूषण।
  • नेवरी: चाँदी का बना आभूषण जो पायल जैसा होता है।
  • बिछुड़ी / चुटकी: पैर की अंगुली में पहनी जाने वाली छोटी अंगूठी जिस पर मछली का चित्र होता है।
  • गोल्या: चौड़े आकार का चाँदी का आभूषण (नड़ियों का नियंत्रण करता है)।
  • अन्य: पायल, टणका, कड़ा, झांजर, पंजनी, फोलरी, पगपान।
पुरुषों एवं बच्चों के विशेष आभूषण
  • पुरुषों के सिर आभूषण: कलंगी (पार्वती का प्रतीक), सिरपैच, तुर्रा (शिव का प्रतीक), बुगबूगी।
  • पुरुषों के कान आभूषण: मुरकियाँ (ठोस सोने/चांदी के कुड़क), बालियाँ, छेलकड़ी।
  • बच्चों के आभूषण: कंदुल्या (हाथ-पाँव का कड़ा), झांजरिया/पैंजणी, नजरिया (काले/लाल कपड़े में मूँगा, कौड़ी बांधकर नजर से बचाने हेतु)।
राजस्थान की प्रथाएँ, रीति-रिवाज़ एवं भाषा-बोलियाँ

राजस्थान कला एवं संस्कृति

अध्याय 21: प्रथाएँ एवं रीति-रिवाज़ | अध्याय 22: राजस्थानी भाषा एवं बोली

1. प्रमुख सामाजिक प्रथाएँ व उन पर प्रतिबंध

  • संथारा / संलेखना: जैन धर्म में अन्न-जल छोड़कर मोक्ष प्राप्ति हेतु शरीर त्याग की प्रथा। चंद्रगुप्त मौर्य ने श्रवणबेलगोला में संथारा किया था।
  • समाधि प्रथा: साधु-संतों द्वारा पानी या भूमि में जीवित समाधि लेना। जयपुर में मेजर लुडलो ने 1844 ई. में इस पर रोक लगाई। (1861 ई. में पूर्ण बंद)।
  • सती प्रथा:
    • प्रथम प्रमाण: भारत में एरण अभिलेख (510 ई., गोपराज की रानी)। राजस्थान में घटियाला अभिलेख (861 ई., राणुका की पत्नी संपल देवी)।
    • प्रतिबंध: राजस्थान में सर्वप्रथम 1822 ई. में बूंदी रियासत ने रोक लगाई। 1829 में राजा राममोहन राय के प्रयासों से लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने गैर-कानूनी घोषित किया।
    • अंतिम प्रमाण: सितंबर 1987 में देवराला (सीकर) की रूपकंवर। इसके बाद 1987 में सती निवारण अधिनियम बना (3 जनवरी 1988 से लागू)।
  • जोहर प्रथा: संकट के समय स्त्रियों द्वारा अग्नि या जल में कूदकर प्राण त्यागना। राजस्थान का प्रथम प्रमाणित साका/जोहर 1301 ई. में रणथंभौर में रानी रंगदेवी के नेतृत्व में हुआ।
  • बाल विवाह प्रथा: हरविलास शारदा व लॉर्ड इरविन के प्रयासों से 1929 में 'शारदा एक्ट' बना (1 अप्रैल 1930 से लागू)। 2006 में बाल-विवाह प्रतिषेध अधिनियम बना (10 जनवरी 2007 से लागू)।
  • कन्या वध: 1833 ई. में कोटा रियासत ने सर्वप्रथम रोक लगाई। (1834 बूंदी, 1844 जयपुर व जोधपुर)।
  • डाकन प्रथा / चुड़ैल प्रथा: आदिवासियों में प्रचलित। 1853 ई. में मेवाड़ (खैरवाड़ा) में जे.सी. ब्रुक व स्वरूप सिंह ने रोक लगाई।
  • दापा प्रथा: वधू मूल्य वसूलने की प्रथा (दहेज का उल्टा)।
  • सांगड़ी / बंधुआ मज़दूर प्रथा: किसान द्वारा ऋण न चुका पाने पर मुफ़्त मज़दूरी करना। 1961 के अधिनियम द्वारा 1975 में समाप्त।
  • मानव व्यापार: 1831 ई. में कोटा राज्य में सर्वप्रथम बंद करने का प्रयास किया गया।
  • दास प्रथा: कौटिल्य के अर्थशास्त्र व अकबर (1562 ई.) द्वारा रोक का उल्लेख। 1832 ई. में विलियम बैंटिंक ने अंत किया।
  • नाता प्रथा: पूर्व पति को छोड़कर अन्य व्यक्ति के साथ रहना (आदिवासियों में प्रचलित)।

2. जीवन के 16 संस्कार

  • 1. गर्भाधान: गर्भ में आने पर किया जाने वाला प्रथम संस्कार।
  • 2. पुंसवन: पुत्र प्राप्ति की इच्छा हेतु तीसरे-चौथे माह में।
  • 3. सीमंतोनयन: गर्भवती स्त्री को अमंगलकारी शक्तियों से बचाना।
  • 4. जातकर्म: शिशु जन्म पर शहद व घी चटाना (घूंटी देना)।
  • 5. नामकरण: जन्म के 10-11 दिन बाद नाम रखना।
  • 6. निष्क्रमण: 2-3 माह बाद शिशु को प्रथम बार घर से बाहर निकालना।
  • 7. अन्नप्राशन: 5-6 माह बाद पहली बार अन्न खिलाना।
  • 8. चूड़ाकर्म / जडूला: 2-3 वर्ष की आयु में प्रथम बार मुंडन।
  • 9. कर्णवेध: 4-5 वर्ष की आयु में कान छेदना।
  • 10. विद्यारंभ: 5-6 वर्ष की आयु में अक्षर ज्ञान प्रारम्भ।
  • 11. उपनयन (जनेऊ): यज्ञोपवीत धारण कर आश्रम जाना।
  • 12. वेदारंभ: गुरु के पास वेदों की शिक्षा प्रारम्भ करना।
  • 13. केशांत / गोदान: किशोरावस्था में दाढ़ी-मूंछ कटवाना।
  • 14. समावर्तन: शिक्षा पूर्ण होने पर गृहस्थाश्रम में लौटना।
  • 15. पाणिग्रहण: विवाह संस्कार।
  • 16. अंत्येष्टि: मृत्यु के पश्चात अंतिम संस्कार।

3. विवाह एवं जन्मोत्सव संबंधी रस्में

वैवाहिक रस्में
  • सागई / सगाई: रिश्ता पक्का करना (वागड़ में 'समपण')।
  • चिकनी कोथली: सगाई के बाद वधू पक्ष को तीज/गणगौर पर उपहार भेजना।
  • भात भरना / मायरा: ननिहाल पक्ष (मामा) द्वारा आर्थिक सहयोग देना।
  • बिंदौरी: वर/वधू को घोड़ी पर बैठाकर जुलूस निकालना।
  • पीठी / हलदायत: हल्दी का उबटन लगाना।
  • सामेला / मधुपर्क: वधू पक्ष द्वारा बारात का स्वागत करना (अगुवानी)।
  • तोरण मारना: वर द्वारा द्वार पर लगे तोरण को स्पर्श करना।
  • हथलेवा / पाणिग्रहण: वधू का हाथ वर के हाथ में सौंपना।
  • पहरावणी / रंगबरी: वधू पक्ष द्वारा बारात को उपहार/राशि देना।
  • गौना / मुकलावा: शादी के बाद बालिग होने पर वधू को ससुराल भेजना।
जन्म संबंधी रस्में
  • जलवा / कुआँ पूजन: प्रसूता महिला द्वारा बच्चे के जन्म के 21वें दिन कुएँ की पूजा।
  • ढूंढ पूजन: बच्चे के जन्म के बाद पहली होली पर ननिहाल से वस्त्र व खिलौने आना।
  • सुआ: जन्म के समय 10 दिनों का अशौच/सूतक।
  • घूंटी: बच्चे को पहली बार पिलाया जाने वाला तरल पदार्थ।
  • छठ पूजा: जन्म के 6ठे दिन का पूजन।
  • नामकरा: नामकरण संस्कार।

4. मृत्यु संबंधी रीति-रिवाज़

  • अर्थी / बैकुंठी: मृत शरीर को श्मशान ले जाने वाली काष्ठ शैया।
  • पिंड दान: जौ के आटे से बने पिंड का दान।
  • आघेटा: श्मशान ले जाते समय चौराहे पर दिशा/पासे बदलना।
  • बिखेर: यात्रा में अर्थी पर पैसे उछालना।
  • कपालक्रिया: शवदाह के समय सिर फोड़कर घृत डालना।
  • सांतरवाड़ा / मोकाण: सांत्वना देने जाना।
  • फूल चुनना: तीसरे दिन अस्थियाँ/राख चुनकर पवित्र नदियों में प्रवाहित करना।
  • मौसर / नुक्ता: मृत्यु के 12वें दिन दिया जाने वाला मृत्युभोज (कुप्रथा)।
  • जोसर: जीवित रहते ही स्वयं का मृत्युभोज देना।

5. प्रमुख लोक विश्वास (शुभ व अशुभ)

शुभ शकुन
  • यात्रा के समय जल से भरा घड़ा, मेहतर या शकुन चिड़िया दिखना।
  • यात्रा पर निकलते समय गुड़/दही खाना।
  • नवरात्रों में चील या गरुड़ के दर्शन होना।
अपशकुन
  • मंगलवार को मिट्टी खोदना या चौका लगाना।
  • गुरुवार को सिर/वस्त्र धोना या हजामत बनवाना।
  • घर से बाहर निकलते ही खाली घड़ा, सूखी लकड़ी या बिल्ली का रास्ता काटना।
  • तारा टूटना या घर में मकड़ी के जाले होना।

6. अध्याय 22: राजस्थानी भाषा एवं बोली

  • राजभाषा स्थिति: भारत की राजभाषा हिंदी (अनुच्छेद 343, 14 सितम्बर 1949)। संविधान की 8वीं अनुसूची में 22 भाषाएँ हैं, किंतु राजस्थानी भाषा इसमें शामिल नहीं है।
  • विश्व व भारत में स्थान: राजस्थानी भाषा विश्व में 16वें तथा भारत में 7वें स्थान पर बोली जाती है।
  • सर्वाधिक क्षेत्र व प्रयोग: क्षेत्रफल की दृष्टि से सर्वाधिक मारवाड़ी तथा सर्वाधिक लोगों द्वारा ढूंढाड़ी बोली जाती है।
  • उत्पत्ति: शौरसेनी अपभ्रंश / मरुगुर्जरी अपभ्रंश से।
  • राजस्थानी भाषा दिवस: 21 फरवरी (हिंदी भाषा दिवस: 14 सितम्बर)।
  • ऐतिहासिक ग्रंथ व उल्लेख:
    • उद्योतन सूरि रचित 'कुवलयमाला' (वि.सं. 835) में 18 देशी भाषाओं में राजस्थानी को 'मरुभाषा' कहा गया है।
    • अबुल फजल ने आइन-ए-अकबरी में इसे 'मारवाड़ी' कहा।
    • सर्वप्रथम 'राजस्थान' शब्द का प्रयोग कर्नल जेम्स टॉड ने किया।
    • डॉ. जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने 1912 ई. में अपने ग्रंथ 'लेंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया' में सर्वप्रथम 'राजस्थानी' शब्द का प्रयोग किया व भाषा का वैज्ञानिक विभाजन किया।
प्रसिद्ध कहावत: "दो कोस पर पानी बदले, नौ कोस पर वाणी।"