संगीत के घराने एवं लोक नृत्य (Folk Dances)

राजस्थान कला एवं संस्कृति 

1. संगीत के प्रमुख घराने

जयपुर घराना

संस्थापक: मनरंग (भूपत खाँ)। यह ख्याल शैली का घराना है। प्रसिद्ध कलाकार: अलाउद्दीन खाँ, तानसेन पांडेय।

दिल्ली घराना

संस्थापक: मियाँ सारंग। इसे तानरस घराना भी कहते हैं। प्रमुख: तानरस खाँ।

अतरौली घराना

संस्थापक: अल्लादिया खाँ। यह जयपुर घराने की उपशाखा है।

मथुरा घराना

संस्थापक: महताब खाँ। भगवान कृष्ण से संबंधित हवेली संगीत का गायन।

मेवाती घराना

ध्रुपद व ख्याल गायन हेतु प्रसिद्ध। नजीर खाँ रामसिंह के दरबारी गायक थे।

डागर घराना

ध्रुपद गायन के लिए जाना जाता है। संस्थापक: बहराम खाँ डागर।

लंगा व मांगणियार गायकी

लंगा: जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर (सारंगी व कमायचा)।
मांगणियार: बाड़मेर व जैसलमेर (खड़ताल व कमायचा)। 2022 में जयपुर में मांगणियार अनुसंधान परिषद की स्थापना।

2. भारत के प्रमुख शास्त्रीय एवं प्रसिद्ध नृत्य

भरतनाट्यम (तमिलनाडु): यामिनी कृष्णमूर्ति, सोनल मानसिंह, रुक्मिणी देवी।

कुचिपुड़ी (आंध्र प्रदेश): वेदांतम, राधा रेड्डी, राजा रेड्डी, यामिनी कृष्णमूर्ति।

कथकली (केरल): मुकुट धारण कर तांडव भाव में अभिनय; वल्लठोल नारायण, मृणालिनी साराभाई।

मोहिनीअट्टम (केरल): महिलाओं द्वारा साड़ी व चमेली की माला पहनकर प्रस्तुत।

ओडिशी (ओडिशा): देवादसियों द्वारा; राधा-कृष्ण प्रेम कथा।

बिहू (असम): बोहाग बिहू, माघ बिहू, वैशाख बिहू।

छऊ (बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल): मुखौटा प्रधान नृत्य।

यक्षगान (कर्नाटक): सुग्रीव विजय इसका प्रसिद्ध नाटक।

सतरिया (असम): शंकरदेव द्वारा शुरू शास्त्रीय नृत्य।

3. कथक एवं राजस्थान का राज्य नृत्य 'घूमर'

  • कथक नृत्य: राजस्थान का एकमात्र शास्त्रीय नृत्य।
    • जयपुर घराना: प्राचीनतम हिन्दू घराना (प्रवर्तक: भानू जी)।
    • लखनऊ घराना: नवीनतम मुस्लिम घराना (विकास: वाजिद अली शाह के समय)।
  • घूमर नृत्य: राजस्थान का राज्य नृत्य, "नृत्यों की आत्मा/सिरमौर"।
    • लहंगे के घेरे (घूम) के कारण नाम घूमर पड़ा। आठ मात्रा की 'सवाई' चाल।
    • रूप: घूमर (साधारण स्त्रियाँ), लूर (राजपूत स्त्रियाँ), घुमरिया (बालिकाएँ)। 1986 में राजस्थान घूमर अकादमी की स्थापना।

4. राजस्थान के प्रमुख क्षेत्रीय नृत्य

गैर नृत्य

बाड़मेर व मेवाड़ (होली पर)। छड़ें 'खांडे' व नर्तक 'गैरिये' कहलाते हैं। (तलवारों की गैर - मेनाार, आंगी-बांगी गैर - बाड़मेर, घूमर गैर - भीलवाड़ा)।

गींदड़ नृत्य

शेखावाटी (होली पूर्व)। नगाड़ा वाद्य यंत्र। साधु, सेठ-सेठानी, दूल्हा-दुल्हन आदि स्वांग रचे जाते हैं।

कच्छी घोड़ी नृत्य

शेखावाटी, डीडवाना। व्यावसायिक नृत्य; काठ की घोड़ी पहनकर पैटर्न बनाने की कला व फर्जी युद्ध।

चरी नृत्य

किशनगढ़ (अजमेर)। गुर्जर जाति की महिलाओं द्वारा। सिर पर चरी में काकड़े (कपास के बीज) जलाकर नृत्य। प्रसिद्ध नृत्यांगना: फलकू बाई

ढोल नृत्य

जालौर का प्रसिद्ध (माली, ढोली व भील पुरुषों द्वारा)। 'थाकना' शैली में ढोल बजाया जाता है। प्रकाश में लाने का श्रेय: जयनारायण व्यास।

अग्नि नृत्य

कतरियासर (बीकानेर)। जसनाथी सिद्धों द्वारा जलते हुए अंगारों (मतीरा फोड़ना) पर प्रस्तुत।

तेरहताली नृत्य

रामदेवरा (पोकरण)। कामड़ जाति की बहुओं द्वारा प्रस्तुत व्यावसायिक नृत्य। 13 मंजीरे शरीर पर बाँधे जाते हैं। प्रसिद्ध नृत्यांगना: मांगी बाई

घुड़ला नृत्य

मारवाड़ (जोधपुर)। छिद्रित मटके में दीपक रखकर महिलाओं द्वारा (चैत्र कृष्णा अष्टमी से चैत्र शुक्ला तृतीया)।

बमरसिया नृत्य

डीग, भरतपुर। फाल्गुन में नई फसल की खुशी में बड़ा नगड़ा (बम) बजाकर।

5. राजस्थान के जनजातीय एवं जातीय नृत्य

कालबेलिया जाति

प्रसिद्ध नृत्य: शंकरिया (युगल प्रेम कथा), पणहारी, इण्डोणी, बागड़िया (भीख मांगते समय), पुंगी नृत्य, बिछुड़ा नृत्य।

विशेष: 2011 में यूनेस्को (UNESCO) की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल। प्रसिद्ध नृत्यांगना: गुलाबो

गरासिया जनजाति

नृत्य: वालर (बिना वाद्य यंत्र के, 'गरासियों की घूमर'), गौर, जावरा, मांदल, लूर, मोरिया, कूद, रायन।

भील जनजाति

नृत्य: नेजा (होली पर खेल नृत्य), शिकार नृत्य, सूकर का मुखौटा नृत्य, हाथीमना (विवाह पर घुटनों के बल बैठकर)।

कंजड़ एवं मेव जाति

कंजर: धाकड़ नृत्य, चकरी नृत्य (तेज गति के चक्कर, चांचोड़ा के रशीद अहमद ने प्रसिद्ध किया), फूंडी नृत्य।
मेव: रणबाजा नृत्य (युगल युद्ध नृत्य), रतबई/खारी नृत्य।