राजस्थान के संत, संप्रदाय एवं धर्म

राजस्थान के संत, संप्रदाय एवं धर्म

राजस्थान कला एवं संस्कृति | संपूर्ण हस्तलिखित/प्रिंटेड नोट्स का सार

धार्मिक अवधारणा: राजस्थान में वैष्णव धर्म का सर्वप्रथम उल्लेख घोसुण्डी शिलालेख में मिलता है। भक्ति आंदोलन का प्रारम्भ 14वीं–15वीं सदी में माना जाता है। उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन लाने का श्रेय रामानंद जी को जाता है।

1. प्रमुख दर्शन एवं आचार्य

शंकराचार्य
  • जन्म: कलाड़ी गाँव (केरल)।
  • सिद्धांत: अद्वैतवाद (820 ई. में 32 वर्ष की आयु में निधन)।
  • पीठें: उत्तर (ज्योतिषपीठ - बद्रीनाथ), दक्षिण (शृंगेरी पीठ - मैसूर), पश्चिम (शारदा पीठ - द्वारिका), पूर्व (गोवर्धन पीठ - जगन्नाथ पूरी)।
रामानुजाचार्य
  • जन्म: श्रीपेरंबदूर/तिरुपति नगर (1017 ई.)।
  • सिद्धांत: विशिष्टाद्वैतवाद (ब्रह्म व जीव एक हैं)।
  • मुख्य ग्रन्थ: वेदान्त सार, वेदान्त संग्रह, श्री भाष्य।
रामानंद जी
  • जन्म: 1299 ई. प्रयाग (उ.प्र.)।
  • विशेषता: भक्ति में सर्वप्रथम महिलाओं को शामिल किया; संस्कृत की जगह हिन्दी में उपदेश दिए।
  • प्रमुख 12 शिष्य: सन्त पीपा, सन्त रैदास, कबीर, धन्ना, सेना, साधना आदि।
माध्वाचार्य एवं वल्लभाचार्य
  • माध्वाचार्य: द्वैतवाद सिद्धांत दिया। ब्रह्म संप्रदाय की स्थापना।
  • वल्लभाचार्य: शुद्धाद्वैतवाद सिद्धांत (पुष्टिमार्ग)। इनकी प्रमुख पीठ नाथद्वारा (श्रीनाथ जी) है।

2. प्रमुख संत एवं उनकी रचनाएँ

संत पीपा (क्षत्रिय)
  • मूल नाम: प्रताप सिंह (गागरोन के शासक)।
  • जन्म स्थल: गागरोन दुर्ग (झालावाड़)।
  • गुफा: टोडा रायसिंह (टोंक)।
  • मंदिर: समदड़ी (बालोतरा/बाड़मेर)।
  • विशेष: दर्जी समुदाय के आराध्य देव।
संत रैदास (रविदास)
  • जन्म: काशी (1398 ई.)। मीराबाई के आध्यात्मिक गुरु।
  • छतरी: चित्तौड़गढ़ दुर्ग में।
  • रचनाएँ: 'रैदास की पर्ची'; 30+ पद गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं।
संत धन्ना (जाट)
  • जन्म: धुवन गाँव (टोंक, 1415 ई.)।
  • राजस्थान में धार्मिक आंदोलन के जनक माने जाते हैं।
  • हठपूर्वक भगवान को भोजन कराने वाले संत।
संत जांभोजी (विष्णु अवतार)
  • जन्म: पीपासर (नागौर, 1451 ई.)।
  • स्थापना: 1485 ई. में समराथल धोरा में विश्नोई संप्रदाय (29 नियम)
  • प्रमुख धाम: मुकाम (नोखा, बीकानेर), जांगलू, लालासर।
  • मुख्य ग्रंथ: जम्भसागर, जम्भसंहिता, शब्दवाणी।
संत जसनाथ जी
  • जन्म: कतरियासर (बीकानेर, 1482 ई.)।
  • स्थापना: जसनाथी संप्रदाय (36 नियम)
  • प्रसिद्ध नृत्य: अग्नि नृत्य (कतियासर)।
  • पवित्र प्रतीक: जाल का वृक्ष एवं मोर पंख।
दादू दयाल ('राजस्थान के कबीर')
  • जन्म: अहमदाबाद (1544 ई.)।
  • प्रधान पीठ: नराणा/नारायणा (सांभर, जयपुर)।
  • शिष्य: 152 कुल शिष्य (52 मुख्य 'खंभे' कहलाते हैं) जैसे - रज्जब जी, सुंदरदास जी।
  • सत्संग स्थल: अलख दरीबा कहलाते हैं।

3. मीराबाई एवं प्रमुख महिला संत

मीराबाई ('राजस्थान की राधा')
  • जन्म: कुड़की गाँव (1498 ई.), पिता- रतन सिंह।
  • पति: भोजराज (राणा सांगा के पुत्र)।
  • भक्ति भाव: माधुर्य/कांता भाव (कृष्ण को पति माना)।
  • रचनाएँ: पदावली, गीतगोविंद टीका, नरसी जी रो मायरो (रत्ना खाती द्वारा लिखित)।
  • अंतिम समय: द्वारिका के रणछोड़ जी मंदिर की मूर्ति में विलीन।
अन्य प्रमुख महिला संत
  • दयाबाई व सहजोबाई: संत चरणदास जी की शिष्याएँ (अलवर)।
  • गवरी बाई: 'वागड़ की मीरा' (डूंगरपुर)।
  • राणा बाई: 'राजस्थान की दूसरी मीरा' (हरनावा, नागौर)।
  • समान बाई / कर्माबाई: कृष्ण भक्ति से जुड़ी प्रमुख महिलाएँ।

4. प्रमुख संप्रदाय एवं उनकी पीठें (क्विक लुक)

संप्रदाय संस्थापक / संत प्रधान पीठ / स्थान
चरणदासी संप्रदाय चरणदास जी (42 नियम) दिल्ली
रामस्नेही संप्रदाय रामचरण जी शाहपुरा (भीलवाड़ा) - फूलडोल मेला
लालदासी संप्रदाय लालदास जी नंगला जहाज (भरतपुर) / धोलीधुव
निरंजनी संप्रदाय हरिदास जी ('कलयुग के वाल्मीकि') गाढ़ा (डीडवाना, नागौर)
गुदड़ संप्रदाय संतदास जी दांतड़ा (भीलवाड़ा)
अलखिया संप्रदाय स्वामी लालगिरि बीकानेर
निष्कलंक संप्रदाय संत मावजी साबला (डूंगरपुर) - बेणेश्वर धाम
राजस्थान के लोक देवता - विस्तृत नोट्स

⚔️ राजस्थान के प्रमुख लोक देवता

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🌟 पंच पीर (राजस्थान के पाँच प्रमुख लोक देवता)

राजस्थान में पाँच प्रमुख लोक देवताओं को 'पंच पीर' माना जाता है।

📌 प्रमुख लोक देवताओं का विस्तृत विवरण

1. पाबूजी राठौड़

  • जन्म: 1239 ई. / 1296 वि.सं. को कोलूमंड (फलोदी) में हुआ था।
  • माता-पिता: कमला दे (माता) और धंधलजी राठौड़ (पिता)।
  • उपनाम व मान्यता: इन्हें ऊँटों के देवता, प्लेग रक्षक देवता, लक्ष्मण का अवतार, हाड़-फाड़ के देवता, वचन पालक और शरणागत के रक्षक के रूप में पूजा जाता है।
  • विशेष: देवल चारणी की गायों की रक्षा करते हुए जींदराव खींची से युद्ध में 1276 ई. में वीरगति को प्राप्त हुए। इनकी फड़ सबसे लोकप्रिय है जिसका वाचन रावणहत्था वाद्य यंत्र के साथ नायक/भील जाति के भोपे करते हैं।

2. गोगाजी चौहान

  • जन्म: भाद्रपद कृष्ण नवमी, विक्रम सं. 1003, ददरेवा (चुरू) में हुआ।
  • माता-पिता: बाछल (माता) और जेवर सिंह चौहान (पिता)।
  • उपनाम: इन्हें साँपों के देवता, गोगापीर, जाहरपीर, गौ रक्षक देवता और 'जिंदा पीर' कहते हैं।
  • विशेष: महमूद गनजवी के साथ युद्ध किया था। इनके मंदिर को 'मेड़ी' कहते हैं जो मजारनुमा होती है। इनकी धड़ ददरेवा में तथा शीर्ष (शीश) मेड़ी नोहर (हनुमानगढ़) में स्थित है।

3. रामदेवजी तंवर

  • जन्म: 1409 वि.सं. (1352 ई.) भाद्रपद शुक्ल द्वितीया (बाबी री बीज) को उडकाश्मीर (शिव तहसील, बाड़मेर) में हुआ।
  • माता-पिता: मेनदेदे (माता) और अजमल तंवर (पिता)।
  • उपनाम: इन्हें रुणिचा का धणी, पीरों के पीर, कृष्ण का अवतार और सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है।
  • विशेष: इन्होंने कामड़िया पंथ की शुरुआत की थी और इनकी महिलाओं द्वारा 'तेरह ताली नृत्य' किया जाता है। इनका मुख्य मंदिर रुणिचा (पोकरण, जैसलमेर) में है।

4. हड़बूजी सांखला

  • जन्म: 15वीं सदी में भुंडेल (खींवसर, नागौर) में हुआ।
  • विशेष: यह राव जोधा के समकालीन थे और शकुन शास्त्र के ज्ञाता व योगी थे। इनके मन्दिर में गाड़ी की पूजा की जाती है जिसमें पंगु गायों के लिए चारा लाया जाता है।

5. मेहाजी मांगलिया

  • जन्म: 14वीं सदी में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (जन्माष्टमी) को तापू गाँव (ओसियां, जोधपुर) में हुआ।
  • विशेष: इनका मुख्य मन्दिर बापिणी गाँव (फलोदी) में है। इनके भोक्ता/पुजारी की वंश वृद्धि गोद लेकर चलती है क्योंकि इनके वंशजों के संतान नहीं होती।

6. देवनारायण जी

  • जन्म: 1243 ई. / 1300 वि.सं. माघ शुक्ल छठी को आसींद (भीलवाड़ा) में हुआ।
  • माता-पिता: सैडू खटाणी (माता) और सवाई भोज (पिता)। यह गुर्जर राजवंश (नागवंशी गुर्जर) से संबंधित थे।
  • विशेष: इनकी फड़ सबसे लंबी (25 हाथ) और सबसे छोटी (2x2) है जिस पर 1992 में भारत सरकार द्वारा 2 रुपये का डाक टिकट जारी किया गया था।

📊 प्रमुख लोक देवताओं की सारणी

लोक देवता का नाम जन्म स्थान / मुख्य स्थल विशेष विवरण
पाबूजी राठौड़ कोलूमंड, फलोदी ऊँटों के देवता, प्लेग रक्षक देवता
गोगाजी चौहान ददरेवा, चुरू / नोहर, हनुमानगढ़ साँपों के देवता, जाहरपीर
रामदेवजी तंवर उडकाश्मीर, बाड़मेर (रुणिचा, जैसलमेर) पीरों के पीर, कामड़िया पंथ के प्रवर्तक
हड़बूजी सांखला भुंडेल, नागौर (बैंटी, फलोदी) शकुन शास्त्र के ज्ञाता, गाड़ी की पूजा
मेहाजी मांगलिया तापू, जोधपुर (बापिणी, फलोदी) गौ-रक्षक लोक देवता
देवनारायण जी आसींद, भीलवाड़ा गुर्जर समुदाय के आराध्य, सबसे लंबी फड़
महत्वपूर्ण तथ्य: राजस्थान के लोक देवताओं ने समाज सुधार, गायों की रक्षा, गरीबों और असहायों की सहायता के लिए अपना जीवन समर्पित किया। आज भी ग्रामीण संस्कृति में इन्हें विशेष श्रद्धा के साथ पूजा जाता है।
राजस्थान की लोक-देवियाँ - विस्तृत नोट्स

👑 राजस्थान की लोक-देवियाँ

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📌 लोक देवियों के वर्गीकरण

  • कुलदेवी: जिस देवी को परिवार, वंश या जाति के लोग प्रारम्भ से मानते आ रहे हैं, वह कुलदेवी होती है।
  • इष्टदेवी: जिस देवी को किसी चमत्कार के कारण मानना प्रारम्भ कर दें, वह इष्टदेवी होती है।

🌟 प्रमुख लोक-देवियाँ एवं उनके मन्दिर

1. जीण माता (रैवासा, सीकर)

  • इनका मंदिर हर्ष पहाड़ी, गिरी माला गुफा रलावता गाँव (रैवासा, सीकर) में स्थित है।
  • इनका जन्म चूरू के घांू गाँव में हुआ था (933 ई.)। ध्रवराज इनके पिता थे, जीवणबाई इनके बचपन का नाम था।
  • यह अनंत प्रदेश (सीकर) के चौहानों की कुल देवी है। इनका गीत सभी लोक-गीतों में सबसे लम्बा है।
  • इनके मंदिर में ढाई प्याले शराब चढ़ती है। औरंगजेब की सेना जब मंदिर तोड़ने आई तो यहाँ मधुमक्खियों ने आक्रमण कर दिया जिससे सेना को लौटना पड़ा।

2. करणी माता (देशनोक, बीकानेर)

  • माना जाता है कि जब करणी माता के पुत्र लाखा की मृत्यु हो गई तब करणी माता ने उसे पुनर्जीवित कर दिया।
  • इनका जन्म आश्विन शुक्ल सप्तमी वि. सं. 1444, सुवाप गाँव (फलोदी) में हुआ।
  • यह बीकानेर के राठौड़ों व चारणों की कुल देवी हैं। मंदिर में दो बड़े कड़ाह हैं जिन्हें सावन-भादवा कहते हैं।
  • इनके मंदिर के सफेद चूहों को 'काबा' कहते हैं, जिनके दर्शन शुभ माने जाते हैं।

3. शीतला माता (चाकसू, जयपुर)

  • इनका मंदिर शील की डूंगरी पहाड़ी (चाकसू, जयपुर) में है।
  • शीतला माता को बच्चों की संरक्षिका, महामाई, सैढ़ल माता, संतान प्रदान करने वाली देवी कहा जाता है।
  • यह एकमात्र ऐसी देवी है जिसकी खण्डित प्रतिमा की पूजा होती है। शीतला माता की पूजा खेजड़ी वृक्ष के नीचे होती है।
  • चैत्र कृष्ण अष्टमी को शीतलाष्टमी/बास्योड़ा मनाया जाता है।

4. आवड़ माता / स्वांगिया माता (जैसलमेर)

  • इनका मंदिर जैसलमेर में है, इन्हें उत्तर की ढाल कहते हैं। यह भाटियों की कुलदेवी है।
  • स्वांगिया माता के वंश में मामडिया चारण हुआ जिसके बच्चा नहीं था।

5. केला देवी (करौली)

  • यह महायोगिनी दुर्गामाता का अवतार है। इनका मंदिर त्रिकुट पर्वत (करौली) पर कालीसिल नदी के किनारे स्थित है।
  • यहाँ चैत्र शुक्ल अष्टमी को लक्खी मेला भरता है। इस मेले में लांगुरिया गीत व घुटकन/कनक दंडवत नृत्य किया जाता है। यह यादवों की यादव कुल की कुलदेवी है।

6. सुगाली माता (आउवा, पाली)

  • इनका मंदिर आउवा (पाली) में है। यह कुशालसिंह व चंपावतियों की कुलदेवी है।
  • इन देवी के 10 सिर व 54 हाथ हैं। 1857 की क्रांति में अंग्रेज इसे अपने साथ अजमेर ले गये।

📊 प्रमुख लोक-देवियाँ और उनके मन्दिर (सारणी)

देवी का नाम स्थान (मन्दिर)
अन्नपूर्णा माता उदयपुर
बेदला माता उदयपुर
भंवर माता छोटी सादड़ी, प्रतापगढ़
खोरड़ी माता करौली
मनसा माता चूरू
फलोदी माता खेराबाद्, कोटा
आई माता बिलाड़ा (जोधपुर)
सांचिया माता ओसियां (जोधपुर)
महत्वपूर्ण तथ्य: राजस्थान की लोक-देवियाँ यहाँ की लोक-संस्कृति, धार्मिक आस्था, और वीरता की प्रतीक हैं। विभिन्न जातियों और राजवंशों की कुलदेवी के रूप में इनका विशेष ऐतिहासिक महत्व है।