राजस्थान के वस्त्र एवं परिधान
राजस्थान कला एवं संस्कृति | संपूर्ण हस्तलिखित/प्रिंटेड नोट्स का सार
विशेष नोट: कोट-पैंट जोधपुर का भारत की राष्ट्रीय पोशाक है। पगड़ी को संरक्षण मुगल शासक अकबर (1556-1605 ई.) ने दिया था। राजस्थान में पगड़ी प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती है।
1. पुरुषों के प्रमुख वस्त्र
पगड़ी एवं साफा
- अन्य नाम: पाग, पेचा, साफा, फालियों, घुमालो, फेंटो, सेलो, लपेटो, शिरोत्राण, अमलो, बागा, उष्णीय।
- रतनपेच: पगड़ी पर लगाया जाने वाला विशेष आभूषण।
- बालाबन्द: पगड़ी पर लगाया जाने वाला जरीदार वस्त्र।
- उपरणी: पगड़ी पर लगाया जाने वाला वस्त्र।
- छाबदार: मेवाड़ में पगड़ी बांधने वाले व्यक्ति को कहते हैं।
- पोटिया: आदिवासियों द्वारा पगड़ी के स्थान पर बांधा जाने वाला वस्त्र।
शरीर के ऊपरी अंग के वस्त्र
- जामा: घुटनों तक पहना जाने वाला वस्त्र (अकबर ने इसे 'सर्वगाति' तथा अबुल फजल ने 'टकुचिया' कहा)।
- चोगा: अंगरखी के ऊपर पहना जाने वाला गौन जैसा वस्त्र (सवाई माधो सिंह का चोगा सिटी पैलेस जयपुर में प्रदर्शित है)।
- अंगरखी/बुगतरी: कमर से ऊपर का वस्त्र, जिसे मिरजाई, कानो, डगला, डोडी, गदर, तनसुख, दुताई भी कहते हैं।
- अचकन: अंगरखी का संशोधित रूप (बिना कॉलर का कुर्ता)।
- आत्मसुख: सर्दी से बचने के लिए चोगे के ऊपर ओढ़ा जाने वाला गर्म कपड़ा/रुई का वस्त्र।
- कमरबन्ध/पटका: जामा के ऊपर कमर पर बाँधा जाने वाला वस्त्र जिसमें तलवार या कटार रखी जाती है।
शरीर के निचले अंग के वस्त्र
- ब्रिजेस/रिजस: चूड़ीदार पाजामे की तरह मोटे कपड़े का वस्त्र, जो घुटनों से ऊपर चौड़ा व नीचे तंग होता है (शिकार/पोलो खेल के समय राजपूत पुरुषों द्वारा प्रयुक्त)।
- धोती: कमर से घुटनों तक (लंबाई 4 मीटर, चौड़ाई 90 सेमी.)। सहरिया जनजाति में 'पंछा' व भीलों में तंग धोती 'ढेपाड़ा' कहलाती है।
- खोयतू: भीलों में कमर पर बांधी जाने वाली लंगोटी।
- पाजामा/सूथन: कमर से पैरों तक का ढीला वस्त्र।
ऋतु व अवसर अनुसार पगड़ियाँ
- श्रावण (तीज): लहरिया पगड़ी
- दशहरा: मदील (जरी की पगड़ी)
- विवाह: मोठड़े की पगड़ी
- होली: फूल-पत्तियों वाली पगड़ी
- युद्ध/गर्मी: केसरिया पगड़ी
- शोक: सफेद पगड़ी
2. रियासतकालीन पगड़ियों के प्रकार
| पगड़ी का नाम | स्थान / रियासत |
|---|---|
| अमरशाही / राजशाही / मानशाही | जयपुर |
| उदावतशाही / जसवंतशाही | जोधपुर |
| हमींरशाही पगड़ी | बनेड़ा (भीलवाड़ा) |
| मांडपशाही पगड़ी | कानोड़ (उदयपुर) |
| राठौड़ी पगड़ी | बदनौर (ब्यावर) |
| जसवंतशाही पगड़ी | देवगढ़ (राजसमंद) |
| चूड़ावतशाही पगड़ी | सलूम्बर |
| मानशाही पगड़ी | भैंसरोड़गढ़ (चित्तौड़गढ़) |
3. महिलाओं के प्रमुख वस्त्र एवं ओढ़नियाँ
प्रसिद्ध साड़ियाँ
- कोटा डोरिया (मसूड़िया): कैथून (कोटा) व मांगरोल (बारां) की प्रसिद्ध (राजस्थान की बनारसी साड़ी)।
- सूट की साड़ी: सवाई माधोपुर की प्रसिद्ध।
- फूल पत्तियों की साड़ी: जोबनेर (जयपुर)।
- जामशाही साड़ी: विवाह के समय पहनी जाने वाली साड़ी।
- चूबा-चंदन व स्प्रे प्रिंट साड़ियाँ: नाथद्वारा (राजसमंद)।
- जनेब की साड़ियाँ: कंसुआ (कोटा)।
पोमचा एवं ओढ़नी के प्रकार
- पीला पोमचा: पुत्र जन्म पर प्रसूति द्वारा ओढ़ा जाता है (वंशवृद्धि का प्रतीक)।
- गुलाबी पोमचा: पुत्री जन्म पर ओढ़ा जाता है।
- चीड़ का पोमचा: विधवा महिलाओं द्वारा ओढ़ी जाने वाली काले रंग की ओढ़नी (कोटा की प्रसिद्ध)।
- ताराभांत / केरीभांत / ज्वारभांत / लहरभांत: आदिवासी महिलाओं की प्रमुख ओढ़नियाँ।
- डांगरशाही ओढ़नी: जोधपुर की प्रसिद्ध।
- चांदकली / अवोचण: महिलाओं के सिर पर ओढ़ने के बहुमूल्य वस्त्र।
घाघरा, कंचली व अन्य परिधान
- कछाबू: भील महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला घाघरा।
- नांदणा/नांदणा: नीले रंग का घाघरा जो आदिवासियों में प्रचलित है।
- कुर्ती-कांचली: कमर के ऊपर पहने जाने वाले वस्त्र (कांचली में बाजू होती है)।
- तिलका: मुस्लिम महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला सफेद/रंगीन चोगा।
- लुगड़ा: लछमनगढ़ (सीकर) व मुकंदगढ़ (झुंझुनूं) का प्रसिद्ध।
- दामणी: मारवाड़ में प्रसिद्ध लाल रंग की ओढ़नी जिस पर जरी का काम होता है।
आदिवासी महिलाओं के विशेष वस्त्र
- फड़का: कथौड़ी महिला द्वारा मराठी अंदाज में पहनी जाने वाली साड़ी।
- रेजा: सहरिया स्त्री का विवाह वस्त्र।
- खूसनी: कंजर विवाहित महिला का कमर वस्त्र।
- चक्का सेवरा: कालबेलिया जाति की महिला का वस्त्र।
- पीरिया: भील दुल्हन का पीला घाघरा।
- जामसाई: विवाह के अवसर पर ओढ़ी जाने वाली ओढ़नी।
राजस्थान के प्रमुख आभूषण
राजस्थान कला एवं संस्कृति | सिर से लेकर पैर तक के संपूर्ण आभूषण
सामान्य परिचय एवं पुरातात्विक साक्ष्य:
• राजस्थान में आभूषण को गहना या जेवर भी कहा जाता है।
• कालीबंगा (हनुमानगढ़): काली चूड़ियाँ प्राप्त हुईं।
• चन्दहूड़ो: मनके बनाने का कारखाना मिला।
• रंगमहल: पत्थर-काँच व हड्डी के आभूषण प्राप्त हुए।
• राजस्थान में आभूषण को गहना या जेवर भी कहा जाता है।
• कालीबंगा (हनुमानगढ़): काली चूड़ियाँ प्राप्त हुईं।
• चन्दहूड़ो: मनके बनाने का कारखाना मिला।
• रंगमहल: पत्थर-काँच व हड्डी के आभूषण प्राप्त हुए।
1. सिर व मस्तक के आभूषण
मस्तक एवं ललाट के आभूषण
- शीशफूल: सोने की बनी सांकल जिस पर फूल के चित्र बने होते हैं।
- रखड़ी: मांग के आगे के भाग में पहनी जाती है (इसके पीछे लगा सोने का हुक 'बगड़ी' कहलाता है)।
- धपड़ी: रखड़ी के नीचे माथे के दोनों ओर तीन-चार इंच चौड़ा पत्री।
- झाला: सोने-चांदी की लड़ियाँ जो कानों के पास बालों में लगाई जाती हैं।
- बोरला: बेर के आकार में बना सोने का आभूषण जिसके पीछे हुक व धागा होता है।
- टीका/टीका/तिलक: सोने से बना हुआ फूल जिस पर डायमण्ड लगे होते हैं।
मांग एवं मस्तक के अन्य आभूषण
- बिंदी/बिंदी: सुहागिन स्त्रियों द्वारा माथे के बीचों-बीच लगाई जाती है।
- मोड़: शादी के समय दूल्हे/दुल्हन के सिर पर बांधा जाता है।
- मैमन्द: महिलाओं द्वारा माथे पर पहना जाता है।
- टिड्डी-भलकों: महिलाओं द्वारा मांग भरने के स्थान से थोड़ा नीचे पहना जाता है।
- सिरमांग: मांग भरने की जगह गोल तिल्ली आकार का आभूषण।
- चूड़ारत्न / चूड़ामणि: कुवलयमाला में उल्लिखित सिर का प्रमुख आभूषण।
- अन्य: ताविद, मांगटीका, फिणी, गेड़ी, काचर, सांकली, मौरमींडली, सिरपेच, सुवालको।
2. कान एवं नाक के आभूषण
कान के आभूषण
- झुमकी / झुमका: सोने-चांदी से बना आभूषण जिसके नीचे घुँघरू लगे होते हैं।
- टोपस / कर्णफूल: कानों में लटकाया जाने वाला उल्टे गोल पिंजरे के समान आभूषण।
- पीपल पत्र: पीपल के पत्ते के समान बना आभूषण जो कानों के ऊपरी हिस्से में पहना जाता है।
- झोला: गरासिया महिलाओं का प्रिय आभूषण जो कानों में लटकन की तरह होता है।
- लंग: नाक व कान दोनों में पहना जाता है (प्राथमिकता कान)।
- अन्य कान के आभूषण: चोप, चुनी, बारी, कुड़कली, बाली, कोकरू, छैलकड़ी, झाल, दुरंगली, तड़को, पासी, ओगणिया, एरंगपत्ते आदि।
नाक के आभूषण
- नथ: बाईं नाक में पहनी जाती है; इसमें मोर-मोरनी की आकृति होती है।
- बेसरी: इसमें भी नाचते मोर की आकृति होती है (बणी-ठणी चित्र में प्रेयसी को पहनाई गई है)।
- लूंग: सोने/चांदी का बना आभूषण जिसमें नग लगा होता है (बिना नग का 'कांटा' कहलाता है)।
- चोंप: नाक में पहना जाने वाला आभूषण (ध्यान दें: 'चूँप' दाँत का आभूषण है)।
- भंवरा: बड़ी आकृति में बना लौंग जो विश्नोई समाज की महिलाएँ पहनती हैं।
- अन्य: कांटा, चुनी, लटकन, बलनी, कोकॉ, खीवण, नथड़ी, कड़क।
3. दाँत एवं गले के आभूषण
दाँत के आभूषण
- चूँप: दाँत को खोदकर उसमें सोने की जड़ाई की जाती है।
- रखन: दाँत पर सोने या चाँदी का कवर।
- धांस: दाँतों पर लगाई गई सजावटी ग्रिल।
- मेख: सोने की कील जो दाँत में जड़ी जाती है।
गले के आभूषण
- बजंटी: सोने के मोतियों को कपड़े पर सिलकर बीच में देवी-देवताओं की मूर्तियाँ लगाई जाती हैं।
- हाँसली / खूँगाली: सोने-चांदी से बना चौकोर तथा किनारों पर पतला आभूषण।
- झालरा: सोने-चांदी का आभूषण जिसमें घुँघरू बने होते हैं।
- आड़: चौफेरे के बाद ननिहाल पक्ष द्वारा दुल्हन को पहनाया जाने वाला आभूषण।
- मंगलसूत्र / कण्ठी / मांदलिया: सुहाग का प्रतीक एवं गले में पहनने योग्य आभूषण।
- अन्य: हार, चंद्रहार, गलपट्टा, थमण्यो, चम्पाकली, तिमणियाँ, पोत, हंसहार, सरी, जंजीर, पंचलड़ी।
4. बाजू, कलाई, हाथ व कमर के आभूषण
बाजू एवं कलाई (हाथ)
- भुजबन्द / बाजूबन्द: फूल पत्तियों से बनी सांकल व रेशमी फुंदों से युक्त आभूषण।
- टड्डा: तांबे की छड़ पर सोने का रंग चढ़ाकर बनाया गया बाजू आभूषण।
- बल्लैया: हाथी दाँत या रबड़ की चूड़ियाँ।
- गोखरू: तिकोने दानों वाला चूड़ा जो कलाई पर पहना जाता है।
- हथपान / सोवनपान: पाँचों अंगलियों व कलाई से जुड़ा आभूषण (शादी में दुल्हन को पहनाया जाता है)।
- अंगुथलो / मुद्रिका / अरसी: अंगूठे व अंगलियों में पहनी जाने वाली अँगूठी।
कमर के आभूषण
- कणकती / कन्दोरा: सोने या चाँदी का आभूषण जिसमें चेन लटकी रहती है।
- तगड़ी: चाँदी का बना आभूषण जो कमर में पहना जाता है (इसमें घुँघरू लगे होते हैं)।
- चौथ: पुरुषों द्वारा पहना जाने वाला चाँदी का चौकोर जालीदार आभूषण।
- सटका: घाघरे के नेफे (नाड़ा) में लटकाया जाने वाला सोने-चांदी का आभूषण।
- अन्य: कड़धौड़ी, मेखला, कमरबंद, वसन, करधनी, जंजीर।
5. पैर, पैर की अंगुली एवं पुरुषों व बच्चों के आभूषण
पैर व पैर की अंगुली के आभूषण
- आँवल: लहरदार कड़ा।
- तोड़ा / लंगर: रस्सी की तरह गूँथ कर बनाया गया चाँदी का आभूषण।
- नेवरी: चाँदी का बना आभूषण जो पायल जैसा होता है।
- बिछुड़ी / चुटकी: पैर की अंगुली में पहनी जाने वाली छोटी अंगूठी जिस पर मछली का चित्र होता है।
- गोल्या: चौड़े आकार का चाँदी का आभूषण (नड़ियों का नियंत्रण करता है)।
- अन्य: पायल, टणका, कड़ा, झांजर, पंजनी, फोलरी, पगपान।
पुरुषों एवं बच्चों के विशेष आभूषण
- पुरुषों के सिर आभूषण: कलंगी (पार्वती का प्रतीक), सिरपैच, तुर्रा (शिव का प्रतीक), बुगबूगी।
- पुरुषों के कान आभूषण: मुरकियाँ (ठोस सोने/चांदी के कुड़क), बालियाँ, छेलकड़ी।
- बच्चों के आभूषण: कंदुल्या (हाथ-पाँव का कड़ा), झांजरिया/पैंजणी, नजरिया (काले/लाल कपड़े में मूँगा, कौड़ी बांधकर नजर से बचाने हेतु)।
राजस्थान कला एवं संस्कृति
अध्याय 21: प्रथाएँ एवं रीति-रिवाज़ | अध्याय 22: राजस्थानी भाषा एवं बोली
1. प्रमुख सामाजिक प्रथाएँ व उन पर प्रतिबंध
- संथारा / संलेखना: जैन धर्म में अन्न-जल छोड़कर मोक्ष प्राप्ति हेतु शरीर त्याग की प्रथा। चंद्रगुप्त मौर्य ने श्रवणबेलगोला में संथारा किया था।
- समाधि प्रथा: साधु-संतों द्वारा पानी या भूमि में जीवित समाधि लेना। जयपुर में मेजर लुडलो ने 1844 ई. में इस पर रोक लगाई। (1861 ई. में पूर्ण बंद)।
- सती प्रथा:
- प्रथम प्रमाण: भारत में एरण अभिलेख (510 ई., गोपराज की रानी)। राजस्थान में घटियाला अभिलेख (861 ई., राणुका की पत्नी संपल देवी)।
- प्रतिबंध: राजस्थान में सर्वप्रथम 1822 ई. में बूंदी रियासत ने रोक लगाई। 1829 में राजा राममोहन राय के प्रयासों से लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने गैर-कानूनी घोषित किया।
- अंतिम प्रमाण: सितंबर 1987 में देवराला (सीकर) की रूपकंवर। इसके बाद 1987 में सती निवारण अधिनियम बना (3 जनवरी 1988 से लागू)।
- जोहर प्रथा: संकट के समय स्त्रियों द्वारा अग्नि या जल में कूदकर प्राण त्यागना। राजस्थान का प्रथम प्रमाणित साका/जोहर 1301 ई. में रणथंभौर में रानी रंगदेवी के नेतृत्व में हुआ।
- बाल विवाह प्रथा: हरविलास शारदा व लॉर्ड इरविन के प्रयासों से 1929 में 'शारदा एक्ट' बना (1 अप्रैल 1930 से लागू)। 2006 में बाल-विवाह प्रतिषेध अधिनियम बना (10 जनवरी 2007 से लागू)।
- कन्या वध: 1833 ई. में कोटा रियासत ने सर्वप्रथम रोक लगाई। (1834 बूंदी, 1844 जयपुर व जोधपुर)।
- डाकन प्रथा / चुड़ैल प्रथा: आदिवासियों में प्रचलित। 1853 ई. में मेवाड़ (खैरवाड़ा) में जे.सी. ब्रुक व स्वरूप सिंह ने रोक लगाई।
- दापा प्रथा: वधू मूल्य वसूलने की प्रथा (दहेज का उल्टा)।
- सांगड़ी / बंधुआ मज़दूर प्रथा: किसान द्वारा ऋण न चुका पाने पर मुफ़्त मज़दूरी करना। 1961 के अधिनियम द्वारा 1975 में समाप्त।
- मानव व्यापार: 1831 ई. में कोटा राज्य में सर्वप्रथम बंद करने का प्रयास किया गया।
- दास प्रथा: कौटिल्य के अर्थशास्त्र व अकबर (1562 ई.) द्वारा रोक का उल्लेख। 1832 ई. में विलियम बैंटिंक ने अंत किया।
- नाता प्रथा: पूर्व पति को छोड़कर अन्य व्यक्ति के साथ रहना (आदिवासियों में प्रचलित)।
2. जीवन के 16 संस्कार
- 1. गर्भाधान: गर्भ में आने पर किया जाने वाला प्रथम संस्कार।
- 2. पुंसवन: पुत्र प्राप्ति की इच्छा हेतु तीसरे-चौथे माह में।
- 3. सीमंतोनयन: गर्भवती स्त्री को अमंगलकारी शक्तियों से बचाना।
- 4. जातकर्म: शिशु जन्म पर शहद व घी चटाना (घूंटी देना)।
- 5. नामकरण: जन्म के 10-11 दिन बाद नाम रखना।
- 6. निष्क्रमण: 2-3 माह बाद शिशु को प्रथम बार घर से बाहर निकालना।
- 7. अन्नप्राशन: 5-6 माह बाद पहली बार अन्न खिलाना।
- 8. चूड़ाकर्म / जडूला: 2-3 वर्ष की आयु में प्रथम बार मुंडन।
- 9. कर्णवेध: 4-5 वर्ष की आयु में कान छेदना।
- 10. विद्यारंभ: 5-6 वर्ष की आयु में अक्षर ज्ञान प्रारम्भ।
- 11. उपनयन (जनेऊ): यज्ञोपवीत धारण कर आश्रम जाना।
- 12. वेदारंभ: गुरु के पास वेदों की शिक्षा प्रारम्भ करना।
- 13. केशांत / गोदान: किशोरावस्था में दाढ़ी-मूंछ कटवाना।
- 14. समावर्तन: शिक्षा पूर्ण होने पर गृहस्थाश्रम में लौटना।
- 15. पाणिग्रहण: विवाह संस्कार।
- 16. अंत्येष्टि: मृत्यु के पश्चात अंतिम संस्कार।
3. विवाह एवं जन्मोत्सव संबंधी रस्में
वैवाहिक रस्में
- सागई / सगाई: रिश्ता पक्का करना (वागड़ में 'समपण')।
- चिकनी कोथली: सगाई के बाद वधू पक्ष को तीज/गणगौर पर उपहार भेजना।
- भात भरना / मायरा: ननिहाल पक्ष (मामा) द्वारा आर्थिक सहयोग देना।
- बिंदौरी: वर/वधू को घोड़ी पर बैठाकर जुलूस निकालना।
- पीठी / हलदायत: हल्दी का उबटन लगाना।
- सामेला / मधुपर्क: वधू पक्ष द्वारा बारात का स्वागत करना (अगुवानी)।
- तोरण मारना: वर द्वारा द्वार पर लगे तोरण को स्पर्श करना।
- हथलेवा / पाणिग्रहण: वधू का हाथ वर के हाथ में सौंपना।
- पहरावणी / रंगबरी: वधू पक्ष द्वारा बारात को उपहार/राशि देना।
- गौना / मुकलावा: शादी के बाद बालिग होने पर वधू को ससुराल भेजना।
जन्म संबंधी रस्में
- जलवा / कुआँ पूजन: प्रसूता महिला द्वारा बच्चे के जन्म के 21वें दिन कुएँ की पूजा।
- ढूंढ पूजन: बच्चे के जन्म के बाद पहली होली पर ननिहाल से वस्त्र व खिलौने आना।
- सुआ: जन्म के समय 10 दिनों का अशौच/सूतक।
- घूंटी: बच्चे को पहली बार पिलाया जाने वाला तरल पदार्थ।
- छठ पूजा: जन्म के 6ठे दिन का पूजन।
- नामकरा: नामकरण संस्कार।
4. मृत्यु संबंधी रीति-रिवाज़
- अर्थी / बैकुंठी: मृत शरीर को श्मशान ले जाने वाली काष्ठ शैया।
- पिंड दान: जौ के आटे से बने पिंड का दान।
- आघेटा: श्मशान ले जाते समय चौराहे पर दिशा/पासे बदलना।
- बिखेर: यात्रा में अर्थी पर पैसे उछालना।
- कपालक्रिया: शवदाह के समय सिर फोड़कर घृत डालना।
- सांतरवाड़ा / मोकाण: सांत्वना देने जाना।
- फूल चुनना: तीसरे दिन अस्थियाँ/राख चुनकर पवित्र नदियों में प्रवाहित करना।
- मौसर / नुक्ता: मृत्यु के 12वें दिन दिया जाने वाला मृत्युभोज (कुप्रथा)।
- जोसर: जीवित रहते ही स्वयं का मृत्युभोज देना।
5. प्रमुख लोक विश्वास (शुभ व अशुभ)
शुभ शकुन
- यात्रा के समय जल से भरा घड़ा, मेहतर या शकुन चिड़िया दिखना।
- यात्रा पर निकलते समय गुड़/दही खाना।
- नवरात्रों में चील या गरुड़ के दर्शन होना।
अपशकुन
- मंगलवार को मिट्टी खोदना या चौका लगाना।
- गुरुवार को सिर/वस्त्र धोना या हजामत बनवाना।
- घर से बाहर निकलते ही खाली घड़ा, सूखी लकड़ी या बिल्ली का रास्ता काटना।
- तारा टूटना या घर में मकड़ी के जाले होना।
6. अध्याय 22: राजस्थानी भाषा एवं बोली
- राजभाषा स्थिति: भारत की राजभाषा हिंदी (अनुच्छेद 343, 14 सितम्बर 1949)। संविधान की 8वीं अनुसूची में 22 भाषाएँ हैं, किंतु राजस्थानी भाषा इसमें शामिल नहीं है।
- विश्व व भारत में स्थान: राजस्थानी भाषा विश्व में 16वें तथा भारत में 7वें स्थान पर बोली जाती है।
- सर्वाधिक क्षेत्र व प्रयोग: क्षेत्रफल की दृष्टि से सर्वाधिक मारवाड़ी तथा सर्वाधिक लोगों द्वारा ढूंढाड़ी बोली जाती है।
- उत्पत्ति: शौरसेनी अपभ्रंश / मरुगुर्जरी अपभ्रंश से।
- राजस्थानी भाषा दिवस: 21 फरवरी (हिंदी भाषा दिवस: 14 सितम्बर)।
- ऐतिहासिक ग्रंथ व उल्लेख:
- उद्योतन सूरि रचित 'कुवलयमाला' (वि.सं. 835) में 18 देशी भाषाओं में राजस्थानी को 'मरुभाषा' कहा गया है।
- अबुल फजल ने आइन-ए-अकबरी में इसे 'मारवाड़ी' कहा।
- सर्वप्रथम 'राजस्थान' शब्द का प्रयोग कर्नल जेम्स टॉड ने किया।
- डॉ. जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने 1912 ई. में अपने ग्रंथ 'लेंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया' में सर्वप्रथम 'राजस्थानी' शब्द का प्रयोग किया व भाषा का वैज्ञानिक विभाजन किया।
प्रसिद्ध कहावत: "दो कोस पर पानी बदले, नौ कोस पर वाणी।"