राजस्थान की हस्तकला PYQ
#1. ‘भरत’, ‘सूफ’, ‘हुरम जी’, ‘आरी’ किससे संबंधित हैं- [JEN (Mech.) Diploma 2016]
राजस्थान के पश्चिमी क्षेत्रों (विशेषकर बाड़मेर, जैसलमेर) में कशीदाकारी (Embroidery) को ‘भरत’ कहा जाता है।
- तकनीक: इसमें सूई-धागे से कपड़े पर बारीक काम किया जाता है।
- आरी वर्क: ‘आरी’ एक विशेष हुक वाली सूई होती है जिससे जरदोजी या आरी वर्क का काम होता है।
इसे ‘मुरादाबादी’ या पीतल पर मीनाकारी कहते हैं। इसके प्रमुख केंद्र जयपुर और अलवर हैं।
राजस्थान में टोंक, जयपुर और सालावास (जोधपुर) इसके प्रमुख केंद्र हैं।
यह चीनी मिट्टी के बर्तनों पर नीले रंग से की जाने वाली चित्रकारी है, जो जयपुर की पहचान है।
सिद्धहस्त शिल्पी: कृपाल सिंह शेखावत (पद्मश्री से सम्मानित)।
#2. निम्नलिखित में से कौनसी कपड़े के विभिन्न टुकड़ों से सुन्दर और सजावटी वस्तुएँ बनाने की प्राचीन तकनीक हैं? [राजस्थान पुलिस कॉन्स्टेबल-13.05.2022 (I)]
ऐप्लीक वर्क (Appliqué Work): इसे पैचवर्क या राजस्थान में ‘चटापटी’ का काम भी कहते हैं। इसमें एक आधार कपड़े पर दूसरे रंग-बिरंगे कपड़ों के टुकड़ों को काटकर और सिलकर सुंदर डिजाइन (जैसे पशु-पक्षी, फूल-पत्ती) बनाए जाते हैं।
- भारत में ओडिशा का ‘पीपली’ गाँव ऐप्लीक वर्क के लिए विश्व प्रसिद्ध है।
- राजस्थान में तिलोनिया (अजमेर) और शेखावाटी क्षेत्र इसके लिए जाने जाते हैं।
यह हुक वाली सुई से की जाने वाली बारीक कढ़ाई है, कपड़े के टुकड़े जोड़ने की कला (पैचवर्क) नहीं।
यह सोने-चांदी के तारों (कलाबत्तू) से कपड़े पर की जाने वाली भारी और महंगी शाही कढ़ाई है।
यह कच्छ (गुजरात) की विशिष्ट लोक कढ़ाई का एक प्रकार है।
#3. ‘मोती भारत’ किस जिले में पारंपरिक कढ़ाई का नाम है? [Librarian III Grade 11.09.2022]
मोती भारत (Bead Work): यह जालौर जिले की बहुत ही विशिष्ट कला है।
- विशेषता: इसमें धागों के साथ रंग-बिरंगे मोतियों को पिरोकर कलात्मक डिजाइन तैयार किए जाते हैं।
- उपयोग: ऊंट की सजावट का सामान, तोरण, और महिलाओं के परिधानों पर कढ़ाई करने के लिए प्रसिद्ध है।
सोजत की मेहंदी (GI Tag प्राप्त) और गरासिया जनजाति की संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है।
शेखावाटी भित्ति चित्र (Frescoes) और गोटा-पत्ती कार्य (खंडेला, सीकर) के लिए प्रसिद्ध है।
अपनी चित्रकला शैली (विशेषकर पशु-पक्षियों के सजीव चित्रण) के लिए विश्व विख्यात है।
#4. लप्पा, लप्पी, किरण, गोखरू एवं वाँकड़ी यह सब-[कनिष्ठ अनुदेशक-10.9.2022][ III Grade Teacher-2006 ]
‘गोटा’ (Gota Work): राजस्थान में महिलाओं की ओढ़नी, चुनरी या घाघरे के किनारों पर जो सुनहरे/रूपहले तारों (बादले) से बनी कलात्मक पट्टी लगाई जाती है, उसे ‘गोटा’ कहते हैं।
#5. सीकर के इलाके में कौनसा स्थान गोटा उद्योग हेतु प्रसिद्ध है। [CET-G (S-II) – 28.09.2024] [CET (10+2) : 23.10.2024 (S-II)]
सीकर जिले का ‘खण्डेला’ कस्बा पूरे भारत में अपने गोटा-पत्ती उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।
- विशेषता: यहाँ का बना गोटा अन्य राज्यों में भी बड़े पैमाने पर निर्यात किया जाता है।
- अन्य प्रमुख केंद्र: जयपुर भी गोटा-किनारी के काम के लिए एक प्रमुख और बड़ा केंद्र माना जाता है।
ये सभी सीकर जिले के ही अन्य स्थान/कस्बे हैं, लेकिन ये गोटा उद्योग के स्थापित या प्रसिद्ध केंद्र नहीं हैं।
#6. चाँदी के आभूषणों की तारकशी के लिए राजस्थान का कौनसा स्थान प्रसिद्ध है?[महिला पर्यवेक्षक-06.01.2019] [वनपाल-06.11.2022(S-II)
तारकशी (Tarkashi): चांदी के बहुत ही बारीक तारों से आभूषण और कलाकृतियां बनाने की कला को ‘तारकशी’ कहते हैं।
- प्रसिद्ध केंद्र: राजसमंद जिले का नाथद्वारा इसके लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध है। श्रीनाथजी के मंदिर में भगवान के कई आभूषण इसी कला से निर्मित होते हैं।
- अन्य रूप: लकड़ी (शीशम) पर भी तारकशी (धातु के तारों की जड़ाई) का काम किया जाता है, जो जयपुर और नाथद्वारा में प्रसिद्ध है।
अकोला (दाबू प्रिंट) और बस्सी (काष्ठ कला, बेवाण व कावड़ निर्माण) के लिए प्रसिद्ध है।
अपनी पारंपरिक ब्लॉक प्रिंटिंग — अजरक प्रिंट (अजरक छापा) और मलीर प्रिंट के लिए प्रसिद्ध है।
कठपुतली निर्माण (भारतीय लोक कला मण्डल) और मेवाड़ चित्रकला शैली के लिए जाना जाता है।
#7. कौनसा (हस्तशिल्प-स्थान) सही सुमेलित नहीं है? [VDO Mains -09.07.2022]
गलत सुमेलित युग्म: ‘तारकशी का काम’ नाथद्वारा (राजसमंद) का प्रसिद्ध है, न कि उदयपुर का।
कपड़े को बांधकर रंगने की कला बंधेज कहलाती है। जयपुर का लहरिया और पोमचा बहुत प्रसिद्ध है (जोधपुर भी बंधेज का बड़ा केंद्र है)।
इसे ‘कोटा डोरिया’ भी कहते हैं। कोटा जिले का कैथून और बारां जिले का मांगरोल इसके प्रमुख केंद्र हैं।
चित्तौड़गढ़ के बस्सी गाँव की काष्ठ कला (लकड़ी के खिलौने, कावड़, बेवाण) विश्वविख्यात है।
#8. ‘समुद्र लहर’ नाम का लहरिया कहाँ रंगा जाता है- [JEN (Mech.) Degree 2016]
‘लहरिया’ कपड़े को रंगने की ‘टाई एंड डाई’ (बंधेज) तकनीक है जिसमें आड़ी (तिरछी) धारियां बनाई जाती हैं।
- अवसर: यह विशेष रूप से श्रावण मास और तीज के त्योहार पर महिलाओं द्वारा पहना जाता है।
- जयपुर का महत्व: जयपुर के रंगरेज और नीलगर ‘राजशाही लहरिया’ और ‘समुद्र लहर’ नामक लहरिया रंगने के लिए प्रसिद्ध हैं।
जोधपुर का ‘मोठड़ा’ प्रसिद्ध है। जब लहरिया की धारियां एक-दूसरे को काटती हुई (चेक या क्रॉस पैटर्न) बनाई जाती हैं, तो उसे ‘मोठड़ा’ कहते हैं।
यहाँ का ‘आकोला’ गांव ‘दाबू प्रिंट’ (छपाई) के लिए प्रसिद्ध है, लहरिया के लिए नहीं।
कोटा अपनी ‘कोटा डोरिया’ या ‘मसूरिया’ साड़ियों के लिए विश्वविख्यात है।
#9. संगमरमर की मूर्तियाँ राजस्थान में कहाँ बनती है? [R.A.S. Pre Exam.(cancelled) 1999]
सफेद संगमरमर (White Marble): सफेद संगमरमर की मूर्तियां बनाने का सबसे बड़ा और प्रमुख केंद्र जयपुर है।
शब्दावली: पत्थर की मूर्तियां बनाने वाले पारंपरिक कारीगरों को ‘सिलावट’ कहा जाता है।
लाल पत्थर की मूर्तियां थानागाजी (अलवर) में प्रसिद्ध रूप से बनाई जाती हैं।
यह एशिया की सबसे बड़ी संगमरमर (मार्बल) मंडी है, लेकिन मूर्तिकला का प्राथमिक केंद्र नहीं है।
यहाँ का ‘तलवाड़ा’ गाँव काले संगमरमर की मूर्तियों (सोमपुरा जाति के मूर्तिकारों द्वारा) के लिए प्रसिद्ध है।
यह हरे संगमरमर (Green Marble) के खनन एवं व्यापार के लिए जाना जाता है।
#10. राजस्थान की प्रसिद्ध लोक कला ‘बेवाण’ है- [बेसिक कम्प्यूटर अनुदेशक -18.06.2022]
‘बेवाण’ एक प्रकार का लकड़ी से बना हुआ मिनिएचर मंदिर (छोटा मंदिर) या देव-विमान होता है।
- प्रसिद्ध स्थान: चित्तौड़गढ़ का बस्सी गाँव अपनी काष्ठ कला (लकड़ी की कला) के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ बेवाण बनाए जाते हैं।
- विशेषता: जलझूलनी एकादशी के दिन इन्हीं बेवाणों में ठाकुर जी (भगवान विष्णु/कृष्ण) की झाँकी निकाली जाती है।
विकल्प (1)
खादी के कपड़े पर लोक देवता के जीवन को चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत करना: इसे ‘फड़’ (Phad) कहते हैं। शाहपुरा (भीलवाड़ा) का जोशी परिवार इसके लिए प्रसिद्ध है।
विकल्प (3)
लकड़ी से निर्मित तलवारनुमा आकृति: इसे ‘खांडे’ कहते हैं, जिनका उपयोग रामलीला नाटकों में होता है।
विकल्प (4)
कपाटों (दरवाजों) युक्त लकड़ी से निर्मित मंदिरनुमा आकृति: इसे ‘कावड़’ कहते हैं। यह भी बस्सी में बनती है। इसमें कई दरवाज़े होते हैं जिन पर चित्र बने होते हैं और कहानी सुनाते हुए इन्हें खोला जाता है।
नोट: बेवाण में दरवाज़े नहीं होते, वह खुला सिंहासन होता है।
#11. लकड़ी के बने देव विमान जिनकी देव झूलनी एकादशी पर झाँकी निकाली जाती है, कहलाती है- [JEN (Electric) Diploma- 18.05.2022]
इन्हें ‘चलता-फिरता मंदिर’ या ‘देव विमान’ (बेवाण) कहा जाता है।
पूजा, भोजन या अनुष्ठान के दौरान बैठने या सामग्री रखने के लिए लकड़ी की छोटी चौकी।
लकड़ी की तलवारें (जिनका उपयोग मुख्य रूप से लोक-नाटकों / रामलीला में होता है)।
लकड़ी से बने नक्काशीदार बॉक्स जिनमें कुमकुम, रोली, चावल आदि मांगलिक सामग्री रखी जाती है।
#12. मोजड़ी का संबंध…. से हैं? [राजस्थान पुलिस कॉन्स्टेबल-15.05.2022 (II)]
मोजड़ी (Mojari): राजस्थानी पारंपरिक चमड़े के जूतों को ‘मोजड़ी’ कहा जाता है।
- प्रमुख केंद्र: जोधपुर की कशीदादार मोजड़ी तथा जयपुर की ‘नागरी’ मोजड़ी बहुत प्रसिद्ध हैं।
- अन्य स्थान: जालौर का ‘भीनमाल’ कस्बा भी उत्कृष्ट मोजड़ियों के निर्माण के लिए जाना जाता है।
विवाह के अवसर पर दूल्हा-दुल्हन के लिए बनाई जाने वाली विशेष जूतियों/मोजड़ियों को राजस्थानी संस्कृति में ‘बिनोटा’ (Binota) कहा जाता है।
#13. राजस्थानी लोकचित्रों में से कौनसा कपड़े पर नहीं बनाया जाता है? [राजस्थान पुलिस कॉन्स्टेबल-14.05.2022]
‘पथवारी’ कपड़े पर बना चित्र नहीं है।
यह गाँव के बाहर मार्ग/रास्ते की रक्षक देवी (तीर्थ यात्रा की सफलता की देवी) का स्थान होता है, जो ईंटों या पत्थरों से बना एक छोटा सा चबूतरा या ‘थान’ होता है।
कपड़े पर विशेष रूप से बनाए जाने वाले पारंपरिक चित्रों को ‘पटचित्र’ या ‘पट’ कहा जाता है।
श्रीनाथजी के मंदिर (नाथद्वारा) में मूर्ति के पीछे जो कपड़े का पर्दा लगाया जाता है जिस पर भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं के चित्र होते हैं, उसे ‘पिछवाई’ कहते हैं।
कपड़े के लंबे कैनवास (रेजी/खादी) पर लोक देवताओं (जैसे पाबूजी, रामदेवजी, देवनारायण जी) के जीवन एवं गाथाओं का चित्रांकन ‘फड़’ कहलाता है।
#14. कौनसी राजस्थान में पाई जाने वाली आदिवासी दीवार की एक कला है?[राज.पुलिस कॉन्स्टेबल-14.05.2022]
‘मांडना’ (Mandana): यह राजस्थान की एक प्रसिद्ध पारंपरिक लोक कला है।
- अवसर: मांगलिक अवसरों, त्योहारों और विवाह पर घर की महिलाओं द्वारा आंगन और दीवारों पर बनाया जाता है।
- सामग्री: इसमें खड़िया (सफेद मिट्टी), गेरू और हिरमिच के प्राकृतिक रंगों का उपयोग होता है।
- प्रतीक: इसमें ज्यामितीय आकृतियां और शुभ चिह्न (जैसे स्वास्तिक, कलश, पगल्या/पगलिया) उकेरे जाते हैं।
सवाई माधोपुर और उसके आस-पास के क्षेत्रों में मीना जनजाति की महिलाओं द्वारा दीवारों पर मोर की आकर्षक आकृतियां बनाई जाती हैं, जिन्हें ‘मोरड़ी मांडना’ कहा जाता है।
#15. कहानी कहने की वह कौनसी मौखिक परम्परा है जो राजस्थान में अभी अस्तित्व में है, जहाँ महाकाव्य महाभारत और रामायण की कहानियों के साथ पुराणों की कहानियों, जाति वंशावली और लोक परम्परा की कहानियों को बताया जाता है। [राजस्थान पुलिस कॉन्स्टेबल-13.05.2022 (I)]
‘कावड़’ लकड़ी से बनी एक बहु-कपाटों (दरवाजों) वाली मंदिरनुमा आकृति होती है।
- विशेषता: इन कपाटों पर लाल रंग की पृष्ठभूमि पर काले रंग से पौराणिक कथाओं (रामायण, महाभारत, कृष्ण लीला) के चित्र उकेरे जाते हैं।
- कावड़ बांचना: कथावाचक (कावड़िया भाट) इन कपाटों को एक-एक करके खोलता जाता है और चित्रों के माध्यम से कहानी सुनाता है। इस प्रक्रिया को ‘कावड़ बांचना’ कहा जाता है।
कावड़ का निर्माण विशेष रूप से चित्तौड़गढ़ जिले के बस्सी गाँव में ‘खैरादी’ जाति के काष्ठ-शिल्पियों (सुथारों) द्वारा किया जाता है।
#16. पारम्परिक कलाकार माँगीलाल मिस्त्री किस क्षेत्र में प्रसिद्ध है? [Lab Assistent (Science) -29.06.2022] [CET (10+2) : 22.10.2024 (S-II)]
माँगीलाल मिस्त्री: यह बस्सी (चित्तौड़गढ़) के एक प्रसिद्ध खैरादी (लकड़ी के हस्तशिल्पी) हैं।
- योगदान: इन्होंने राजस्थान की पारंपरिक कावड़ कला को संरक्षित करने और इसमें आधुनिक प्रयोग करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
लकड़ी और कपड़े से बनी धागे वाली कठपुतली कला का प्रमुख केंद्र उदयपुर (भारतीय लोक कला मण्डल) है।
यह महिलाओं द्वारा घर के आँगन या दीवारों पर खड़िया (सफेद मिट्टी) और गेरू से ज्यामितीय आकृतियां बनाने की लोक कला है।
कपड़े के कैनवास पर लोक देवताओं की कथाओं का चित्रांकन। शाहपुरा (भीलवाड़ा) का जोशी परिवार (जैसे श्रीलाल जोशी, पार्वती जोशी) इसके लिए प्रसिद्ध है।
#17. रूपाहली और सुनहरी (स्वर्णिम) छपाई राजस्थान के किन जिलों में प्रसिद्ध है?[वनरक्षक- 13.12.2022(II)]
सुनहरी एवं रुपहली छपाई (Gold & Silver Printing): कपड़ों पर सोने (सुनहरी) और चांदी (रूपाहली) के रंगों या वर्क से छपाई करने की पारंपरिक कला है।
- प्रमुख क्षेत्र: यह छपाई मुख्य रूप से किशनगढ़ (अजमेर), चित्तौड़गढ़ और कोटा क्षेत्रों की प्रसिद्ध है।
- विशेषता: इस विशेष छपाई के बाद कपड़े पर एक आकर्षक और शाही चमक (Shine) आ जाती है।
#18. छातों (अंब्रेला) के लिए प्रसिद्ध है? [ग्राम सेवक, 2008] [महिला पर्यवेक्षक परीक्षा (TSP) – 20.12.2015]
फालना (पाली): राजस्थान के पाली जिले में स्थित फालना कस्बा पूरे भारत में अपने छाता उद्योग (Umbrella Industry) के लिए प्रसिद्ध है।
- उपनाम (Nick Name): यहाँ रेडियो और टेलीविज़न उद्योग भी काफी विकसित रहा है, जिसके कारण इसे ‘मिनी मुम्बई’ भी कहा जाता था।
#19. निम्नलिखित में से किस वस्त्र का संबंध राजस्थान से नहीं है- [राजस्थान पुलिस कॉन्स्टेबल-06.11.2020 (II)]
‘कांधा’ (कांथा / Kantha Work): यह राजस्थान की नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल और ओडिशा की एक प्रसिद्ध पारंपरिक कढ़ाई (Embroidery) कला है।
- विशेषता: इसमें पुराने कपड़ों या साड़ियों को एक साथ जोड़कर धागों से बारीक और कलात्मक सिलाई की जाती है।
यह जयपुर (सांगानेर) की विश्व प्रसिद्ध ब्लॉक प्रिंटिंग है, जिसमें प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करके बारीक बेल-बूटों का चित्रण किया जाता है।
कपड़े को धागे से बांधकर अलग-अलग रंगों में रंगने की कला (Tie & Dye) है। जोधपुर और जयपुर इसके प्रमुख केंद्र हैं।
बाड़मेर की अजरक प्रिंट (नीला और लाल रंग) और मलीर प्रिंट (कत्थई रंग) अपने ज्यामितीय पैटर्न के लिए विश्वविख्यात हैं।
#20. हाल ही में भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री ने राजस्थान की कशीदाकारी शिल्प को भौगोलिक संकेत (जी.आई.टैग) प्रदान किया है। यह शिल्प किस स्थान का प्रसिद्ध है- [Asst. Professor- 7.1.2024]
बीकानेर कशीदाकारी शिल्प: अगस्त 2023 में राजस्थान के जिन 5 हस्तशिल्प उत्पादों को **भौगोलिक संकेत (GI Tag)** मिला था, उनमें यह भी शामिल है।
- विशेषता: इसमें सूती, रेशमी या मखमल के कपड़ों पर विभिन्न प्रकार के टांकों (Stitches) का उपयोग करके बारीक एवं आकर्षक कढ़ाई की जाती है।
1. उदयपुर कोफ्तगिरी धातु शिल्प
हथियारों (तलवार, कटार आदि) की मूठ और सतह पर सोने-चांदी के पतले तारों की महीन नक्काशी।
2. बीकानेर उस्ता कला शिल्प
ऊंट की खाल से बनी वस्तुओं (कुप्पियों, मर्तबान) पर सोने की बारीक मीनाकारी व नक्काशी।
3. जोधपुर बंधेज शिल्प
कपड़े को धागे से बांधकर अलग-अलग मनमोहक रंगों में रंगने की पारंपरिक कला (Tie & Dye)।
4. नाथद्वारा पिछवाई कला
नाथद्वारा मंदिर में श्रीनाथजी की मूर्ति के पीछे कपड़े के पर्दे पर की जाने वाली भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं की चित्रकारी।
Special for RAS Pre, SI, REET, CET Exam
- सांगरी फली: खेजड़ी वृक्ष का फल (मई 2025)
- नागौरी “पान मैथी”: प्रसिद्ध कसूरी / पान मैथी (नागौर)
- पिछवाई कला: नाथद्वारा (राजसमंद) — अगस्त 2023
- जोधपुरी बंधेज: जोधपुर — अगस्त 2023
- कोफ्तगिरी धातु शिल्प: उदयपुर — अगस्त 2023
- बीकानेर कशीदाकारी: सूती, रेशमी, मखमल पर बारीक टांके व दर्पण कार्य — अगस्त 2023
- उस्ता कला शिल्प: ऊंट की खाल पर स्वर्णिम मीनाकारी (बीकानेर) — अगस्त 2023
- सोजत मेहंदी: पाली (सितंबर 2021)
- पोकरण पॉटरी: पोकरण (जैसलमेर – 2018)
• बगरू प्रिंट: जयपुर
• ब्लू पॉटरी & ब्लू पॉटरी (लोगो): जयपुर
• सांगानेरी प्रिंट: जयपुर
• थेवा कला: प्रतापगढ़
• कोटा डोरिया & कोटा डोरिया (लोगो): कोटा
• मोलेला मिट्टी कार्य & (लोगो): मोलेला (नाथद्वारा, राजसमंद)
• कठपुतली & कठपुतली (लोगो): राजस्थान
• फुलकारी: राजस्थान, पंजाब, हरियाणा (संयुक्त)
• बीकानेर भुजिया: बीकानेर (खाद्य उत्पाद)
• मकराना संगमरमर: मकराना (नागौर – प्राकृतिक उत्पाद)
#21. राजस्थान की प्रथम हस्तशिल्प नीति के बारे में निम्न में से कौनसा कथन सही नहीं है? [II Grade (S-II) -29.1.2023]
राजस्थान प्रथम हस्तशिल्प नीति: राज्य की पहली हस्तशिल्प नीति 17 सितम्बर, 2022 को जारी की गई थी।
गलत कथन / सही उत्तर: यह नीति मार्च 2026 तक प्रभावी रहने के लिए बनाई गई है, इसलिए कथन (3) गलत है और यही सही उत्तर है।
असम और ओडिशा के बाद राजस्थान देश का ऐसा तीसरा (3rd) राज्य है जिसने अपनी स्वतंत्र एवं अलग हस्तशिल्प नीति (Handicraft Policy) जारी की है।
बिल्कुल सही, 17 सितंबर 2022 को उद्योग व वाणिज्य विभाग द्वारा आधिकारिक रूप से लॉन्च किया गया था।
इस नीति का मुख्य लक्ष्य 5 वर्षों में 50 हजार से अधिक नए रोजगार सृजित करना और हस्तशिल्पियों को आर्थिक संबल देना है।
विलुप्त होती पारंपरिक हस्तकलाओं को पुनर्जीवित करना तथा उनके संरक्षण हेतु वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्रदान करना इसका प्राथमिक उद्देश्य है।
#22. राजस्थान सरकार द्वारा हस्तशिल्प/कला के क्षेत्र में राज्य स्तरीय पुरस्कार विजेता को कितनी राशि का पुरस्कार दिया जाता है? [LDC Exam -19.08.2018]
राज्य स्तरीय हस्तशिल्प पुरस्कार: राजस्थान में हस्तशिल्पियों को प्रोत्साहित करने के लिए उद्योग व वाणिज्य विभाग द्वारा यह पुरस्कार दिया जाता है।
- मुख्य पुरस्कार: विजेता शिल्पी को ₹25,000 नकद, एक शॉल और दक्षता प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाता है।
राजस्थान लघु उद्योग निगम लिमिटेड (RAJSICO) द्वारा वर्ष 1983 से हस्तशिल्पियों को सम्मानित करने की यह योजना शुरू की गई थी।
मुख्य पुरस्कार के अलावा योग्यता प्रमाण-पत्र (Merit Certificate) पाने वाले शिल्पियों को प्रोत्साहन स्वरूप ₹5,000 की राशि प्रदान की जाती है।
#23. राजस्थान की हस्तशिल्प वस्तुओं को राजस्थान लघु उद्योग निगम किस ब्राण्ड नाम से विपणन करता है? [RPSC LDC. 11 Jan 2014]
राजस्थली (Rajasthali): राजस्थान लघु उद्योग निगम (RAJSICO – स्थापना: 3 जून, 1961) राज्य के हस्तशिल्पियों के उत्पादों के विपणन (मार्केटिंग) और बिक्री के लिए ‘राजस्थली’ ब्रांड नाम से एम्पोरियम चलाता है।
जयपुर (एम.आई. रोड स्थित फ्लैगशिप शोरूम)
राजस्थान के बाहर हस्तशिल्प बिक्री हेतु नई दिल्ली, कोलकाता और मुंबई जैसे बड़े शहरों में भी ‘राजस्थली’ शोरूम संचालित किए जाते हैं।
#24. राजस्थान के कोटा और बाराँ जिले में बनाई जाने वाली ‘चूंदड़ी’ का कार्य…. प्रकार का है- [LDC Exam – 16.09.2018]
चूंदड़ी (चुनरी): यह ओढ़नी का एक प्रसिद्ध प्रकार है जिसमें बारीक बिंदियों का आकर्षक पैटर्न होता है।
- तकनीक: इसे कपड़े को धागे से छोटे-छोटे हिस्सों में बांधकर और फिर रंगकर तैयार किया जाता है, जिसे टाई एवं डाई (बंधेज) कला कहा जाता है।
- प्रमुख क्षेत्र: हाड़ौती क्षेत्र (कोटा और बाराँ) की चूंदड़ी का बंधेज कार्य पूरे राजस्थान में अत्यधिक प्रसिद्ध है।
यह मिट्टी या चीनी मिट्टी के बर्तनों पर कलाकारी है (जैसे जयपुर की प्रसिद्ध ब्लू पॉटरी)।
सुई-धागे से कपड़े के ऊपर नक्काशी व डिज़ाइन बनाना, जिसे बंधेज या डाई कला में शामिल नहीं किया जाता।
कपड़े, कागज या कैनवास पर ब्रश और रंगों से चित्र बनाना (जैसे किशनगढ़ शैली, नाथद्वारा की पिछवाई या मेवाड़ चित्रशैली)।
#25. राजस्थान के निम्न में से किस स्थान पर बड़े और बोल्ड डिजाइन और पैटर्न मुद्रित किये जाते हैं- [Stenographer-15.10.2024]
जोधपुर छपाई एवं बंधेज: राजस्थान के हस्तशिल्प में छपाई (Printing) कला के अलग-अलग केंद्र अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं।
- विशेषता: जोधपुर में छपाई और ‘टाई एंड डाई’ (बंधेज/मोठड़ा) में प्रायः बड़े, चौड़े और बोल्ड पैटर्न (Bold Patterns) का इस्तेमाल किया जाता है।
सांगानेरी प्रिंट अपने बहुत ही बारीक और प्राकृतिक बेल-बूटों (Delicate Floral Patterns) के लिए जाना जाता है, बड़े व बोल्ड पैटर्न के लिए नहीं।
बाड़मेरी छपाई में ज्यामितीय आकृतियों (Geometric Patterns) और गहरे रंगों (लाल व नीले) का प्रयोग अधिक होता है।
चूरू मुख्य रूप से चंदन की लकड़ी की नक्काशी और काष्ठ कला के लिए प्रसिद्ध है, कपड़ा छपाई के लिए नहीं।
(A) बादला — (1) टोंक
(B) ब्ल्यू पॉटरी — (2) जयपुर
(C) नमदा — (3) जोधपुर
(D) अजरक प्रिंट — (4) बाड़मेर
#26. सुमेलित कीजिए- [AEN Exam : 16.05.2014]
‘बादला’ जिंक (जस्ते) धातु से बनी पानी की बोतलें/पात्र होते हैं, जिन पर कपड़े या चमड़े का आवरण चढ़ाया जाता है। यह पानी को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने के काम आती हैं और जोधपुर की अत्यधिक प्रसिद्ध हैं।
चीनी मिट्टी के सफेद बर्तनों पर नीले व अन्य रंगों से की जाने वाली चित्रकारी है। श्री कृपाल सिंह शेखावत को ब्लू पॉटरी में सिद्धहस्तता एवं पुनरुद्धार के लिए ‘पद्मश्री’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
ऊन को बिना बुने, पानी, साबुन और दबाव के साथ कूटकर-जमाकर बनाए जाने वाले पारंपरिक वस्त्र/गलीचे ‘नमदे’ कहलाते हैं। टोंक इसके निर्माण का मुख्य केंद्र है।
कपड़े के दोनों तरफ मुख्य रूप से लाल और नीले रंग में ज्यामितीय छपाई (Printing) करने की कला है।
(1) बादला — (i) जयपुर
(2) नमदा — (ii) लेटा
(3) पाब रजाई — (iii) जोधपुर
(4) खेसला — (iv) टोंक
#27. सुमेलित कीजिए – [CET : 07.01.2023 (S-II)]
जस्ते (जिंक) से निर्मित पानी की बोतलें/पात्र जिन पर कपड़े या चमड़े का आवरण होता है, पानी को ठंडा रखने के लिए जोधपुर की प्रसिद्ध हैं।
ऊन को जमाकर और कूटकर बनाए जाने वाले गलीचे/वस्त्र टोंक के प्रसिद्ध हैं।
जयपुर की महज 250 ग्राम (पाव भर) रुई से बनी अत्यधिक हल्की लेकिन गर्म रजाइयां अपनी गुणवत्ता के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध हैं।
‘खेसला’ सूती धागे से बना एक प्रकार का मोटा ओढ़ने का वस्त्र या चादर होती है। जालोर जिले का लेटा गाँव खेसला उद्योग के लिए पूरे राजस्थान में प्रसिद्ध है।


