कालीबंगा सभ्यता के महत्वपूर्ण प्रश्न

 

Results

#1. निम्नलिखित में से किस पुरास्थल की पहचान टी. एच. हैण्डले ने एक बौद्ध कस्बे के रूप में की थी ? (RAS Pre-2025)

व्याख्या:

बैराठ (प्राचीन नाम: विराटनगर) की पहचान प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् टी. एच. हैण्डले (T. H. Hendley) ने एक बौद्ध कस्बे (Buddhist Township) के रूप में की थी।

बैराठ राजस्थान के जयपुर जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। यह स्थल विशेष रूप से मौर्यकाल और बौद्ध धर्म के अवशेषों के लिए प्रसिद्ध है।

#2. कालीबंगा सभ्यता के संदर्भ में सबसे असत्य कथन का चयन करें। (CET 12th-2024)

व्याख्या: यह कथन इतिहास के अनुसार बिल्कुल गलत है, और इसीलिए यही आपका सही उत्तर है। वास्तव में, कालीबंगा पूरे विश्व में जुते हुए खेत (Ploughed field) के सबसे प्राचीन प्रमाण मिलने के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ पर आड़ी-तिरछी (Grid pattern) जुताई के साक्ष्य मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि यहाँ एक साथ दो फसलें (जैसे चना और सरसों) उगाई जाती थीं।

#3. कौन सी सभ्यता धूलकोट या ताम्रवती नगरी के नाम से प्रसिद्ध है? [CET 12th – 2024]

बेड़च (या आयड़) नदी के किनारे विकसित इस ताम्रपाषाणकालीन स्थल को स्थानीय लोग ‘धूलकोट’ (अर्थात रेत का टीला) कहते हैं और तांबे के औजारों की प्रचुरता के कारण इसे प्राचीन काल में ‘ताम्रवती’ कहा गया है

#4. कोट-डीगी सभ्यता का सम्बन्ध रहा है- [JEN Degree (TSP) Exam – 16.10.2016]

विस्तृत व्याख्या

‘कोट-दीजी’ (Kot Diji) एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है, जो मुख्य रूप से प्राक्-हड़प्पा (Pre-Harappan) या प्रारंभिक हड़प्पा काल से संबंधित है।

इस स्थल से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ इस प्रकार हैं:

  • स्थान: यह पुरास्थल वर्तमान में पाकिस्तान के सिंध प्रांत में खैरपुर के पास स्थित है (मोहनजोदड़ो के निकट)।

  • खोज और उत्खनन: इस स्थल की खुदाई मुख्य रूप से 1955 के आसपास फजल अहमद खान (F. A. Khan) द्वारा की गई थी।

#5. राजस्थान में लौह धातु के प्राचीनतम साक्ष्य किस पात्र संस्कृति में प्राप्त हुए है-[कृषि अधिकारी-19.1.2021]

विस्तृत व्याख्या (सही उत्तर क्यों?)

  • काले एवं लाल रंग की मृद्भाण्ड संस्कृति (Black and Red Ware – BRW): भारतीय पुरातत्व में, विशेषकर राजस्थान के संदर्भ में, लौह धातु के सबसे शुरुआती (प्राचीनतम) प्रमाण इसी संस्कृति के स्तर (Layer) से प्राप्त हुए हैं।

  • प्रमुख पुरास्थल (नोह और जोधपुरा): जब भरतपुर के नोह और जयपुर के जोधपुरा में स्तर-वार (Stratigraphic) खुदाई की गई, तो वहाँ ‘चित्रित सलेटी संस्कृति’ (PGW) से ठीक पहले वाले कालखंड यानी काले एवं लाल मृद्भाण्ड (BRW) के जमाव में लोहे के टुकड़े प्राप्त हुए।

अन्य विकल्पों का विश्लेषण (आपके ज्ञान के लिए)

  • (1) गेरुएँ रंग की मृद्भाण्ड संस्कृति (OCP – Ochre Coloured Pottery): यह संस्कृति लौह युग से बहुत पहले की है और मुख्य रूप से ताम्र-पाषाण काल (Copper Age) से संबंधित है। जोधपुरा और नोह में यह सबसे निचली (सबसे पुरानी) परत में पाई जाती है। यहाँ केवल तांबे के साक्ष्य मिलते हैं।

  • (3) चित्रित सलेटी रंग का मृद्भाण्ड संस्कृति (PGW – Painted Grey Ware): इस काल (लगभग 1000 ईसा पूर्व से 600 ईसा पूर्व) में राजस्थान (जैसे सुनारी, नोह, जोधपुरा) में लोहे का व्यापक रूप से उपयोग शुरू हो गया था। लोहे को गलाने की भट्ठियां और हथियार इसी काल में बहुतायत में मिलते हैं। यह भारत का मुख्य लौह युग है, लेकिन प्रश्न में “प्राचीनतम शुरुआत” पूछी गई है, जो इससे पहले (B&R में) हो चुकी थी।

  • (4) उत्तरी काली चमकीली मृद्भाण्ड संस्कृति (NBPW – Northern Black Polished Ware): यह सबसे नवीनतम संस्कृति है (लगभग 600 ईसा पूर्व के बाद)। यह महाजनपद और मौर्य काल की संस्कृति है, जिसे भारत के ‘द्वितीय नगरीकरण’ से जोड़ा जाता है। इस समय तक लोहे का उपयोग अपने सर्वोच्च स्तर पर पहुँच चुका था।



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