राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएं PDF Notes
GovrFever.in
📚 राजस्थान की प्राचीन सभ्यताएँ
Complete Handwritten Exam-Oriented Notes | Website Watermark: GovrFever.in
🏛️ 1. कालीबंगा सभ्यता (हनुमानगढ़)
भाषा: सिंधी (पंजाबी)
शाब्दिक अर्थ: काले रंग की चूड़ियाँ
प्राचीनता: लगभग 6 हजार वर्ष प्राचीन (RBSE 10th Book) / 2400-2250 ई. पूर्व की संस्कृति
खोज: अमलानंद घोष (1952) - भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक
प्रथम जानकारी: एल.पी. टैस्सिरी द्वारा दी गई
उत्खनन: 1961-69 (बृजवासी लाल [B.B. Lal], बालकृष्ण थापर [B.K. Thapar], एम.डी. खरे, जे.पी. जोशी, के.एम. श्रीवास्तव, एस.पी. जैन द्वारा)
नदी: घग्घर नदी (प्राचीन दृश्यद्वती और सरस्वती नदी)
स्तर: 5 स्तर (प्राक-हप्पा से विकसित हड़प्पा तक)
उपनाम: दीन-हीन / निर्धन बस्ती (कच्ची ईंटों के प्रयोग के कारण), कांस्ययुगीन सभ्यता
📌 महत्वपूर्ण विशेष तथ्य:
- इतिहासकार दशरथ शर्मा ने कालीबंगा को "सिंधु घाटी सभ्यता की तीसरी राजधानी" कहा है।
- पाकिस्तान में कोटदीजी स्थल से कालीबंगा की हड़प्पा-पूर्व की सभ्यता से मिलते-जुलते अवशेष मिले हैं।
- एक बच्चे के कंकाल की खोपड़ी से 6 छिद्र (मस्तिष्क शोध / हाइड्रोस्पोलिस) - शल्य चिकित्सा के प्राचीनतम प्रमाण।
- राजस्थान में जूते हुए खेत के अवशेष एवं एक साथ दो फसलें (संभवतः गेहूँ, जौ) उगाने के साक्ष्य तथा भूकम्प आने के प्राचीनतम साक्ष्य यहीं से मिले।
- विश्व में सर्वप्रथम लकड़ी की नाली के अवशेष, बेलनाकार मुहरें (जो मेसोपोटामिया/ईरान सभ्यता से मिलती हैं)।
- कालीबंगा दो टीलों में विभाजित थी: पश्चिमी टीला (गढ़/दुर्ग - ऊँचा, किलेबंदी) और पूर्वी टीला (नगर क्षेत्र - नीचा)। मकान कच्ची ईंटों (धूप में पकाई गई) से बने थे।
- यहाँ की लिपि सिंधु लिपि थी जिसे दायें से बाएँ लिखा जाता था (ब्रोस्ट्रोफेडन शैली)। 1985-86 में यहाँ कालीबंगा संग्रहालय की स्थापना की गई।
🔍 कालीबंगा से प्राप्त प्रमुख अवशेष:
• अण्डाकार / चिरायु कब्र, ईंटों से निर्मित चबूतरे
• सात आयताकार हवनकुण्ड / सामूहिक तन्दूर
• मुद्रा पर व्याघ्र व महिला कुमार देवी का चित्र, हाथी दाँत की कंघी, एक पल्ली का दरवाजा
• ताँबे की आक्रामक मुद्रा में वृषभ मूर्ति, अलंकृत ईंटें, ऊँट की अस्थियाँ, कलश सवधान
• खिलौना गाड़ी व पहिया, युगल समाधियाँ, मंदिरों के अवशेष नहीं
• समकोण पर काटती सड़कें (ऑक्सफोर्ड / ग्रिड पद्धति), मृणपट्टिका पर सींगयुक्त देवता की आकृति
• काली व सफेद रेखा वाले लाल रंग के बर्तन, मातृदेवी की कोई मूर्ति नहीं, स्पष्ट जल निकास प्रणाली का अभाव
🏛️ 2. आहाड़ सभ्यता (उदयपुर)
जिला/स्थान: उदयपुर (बनास तथा उसकी सहायक नदियों के किनारे धूलकोट टीले के नीचे)
नदी: आयड़ / बेड़च नदी
प्राचीनता: लगभग 4000 वर्ष पुरानी (ताम्रपाषाणिक / ताम्रयुगीन संस्कृति)
खोज: अक्षयकीर्ति व्यास (1953)
उत्खनन: रतनचन्द्र अग्रवाल (1956), हसमुख धीरज सांकलिया (H.D. Sankalia - 1961) द्वारा सर्वाधिक कार्य।
उपनाम: ताम्रवती नगरी, आघाटपुर, धूलकोट, बनास संस्कृति, मृतकों के टीलों की सभ्यता
📌 महत्वपूर्ण विशेष तथ्य:
- आहाड़ एक ग्रामीण संस्कृति थी। अर्थव्यवस्था पशुपालन व कृषि पर टिकी थी। यहाँ के लोग चावल, गेहूँ, ज्वार, बाजरा, जौ आदि से परिचित थे।
- गंदे पानी के निकास के लिए चक्रकूप (Ring Wells) प्रयोग में लाए जाते थे।
- मृद्भाण्डों की मुख्य विशेषता - काला व लाल रंग (Black and Red Ware - B&RW) व उल्टी बताई शैली।
- अनाज रखने के बड़े मृद्भाण्ड 'गोरे/कोठे' कहलाते थे। आहाड़वासी सूती वस्त्रों की रंगाई-छपाई से परिचित थे तथा मृतकों को गहनों व आभूषणों के साथ दफनाते थे।
- यहाँ से लेपिस लाजुली (नीले रंग का पत्थर) मिलने से ईरान के साथ व्यापारिक संबंध का अनुमान लगाया गया।
🔍 आहाड़ से प्राप्त प्रमुख अवशेष:
• मिट्टी व पत्थर के मनके, आटा पीसने की चक्की, सिलबट्टे
• 6 ताँबे की मुद्राएँ, 3 मुहरें (मुहरों पर यूनानी भाषा का अंकन व अपोलो देवता का चित्र)
• ताँबा गलाने की भट्टियाँ, बिना हत्थे के छोटे जलपात्र, ताँबे की कुल्हाड़ियाँ, अंगूठियाँ
• दो-तीन मुँह वाले चूल्है, एक मकान में 6 चूल्है (सामूहिक परिवार के अवशेष), 8 उत्खनन स्तर
• ईरानी शैली की धूपदानी, मिट्टी से बनी वृषभ मूर्ति (बनासियन बुल), तांबे की चादरें व चूड़ियाँ
🏛️ 3. बैराठ सभ्यता (कोटपूतली-बहरोड़)
स्थान: कोटपूतली-बहरोड़ (पूर्व में जयपुर)
नदी: बाणगंगा नदी
प्राचीन नाम: विराट नगर (मत्स्य जनपद की राजधानी) - महाभारत काल में पाण्डवों ने अज्ञातवास यहीं बिताया था।
खोजकर्ता: दयाराम साहनी (1937)
उत्खनन: नीलरत्न बनर्जी, कैलाशनाथ दीक्षित (1962-63)
उपनाम: अलवर का सिंहद्वार, प्राचीन युग की चित्रशाला (शैल्चित्रों के कारण)
📌 महत्वपूर्ण विशेष तथ्य:
- बीजक पहाड़ी, भीमली की डूँगरी, महादेव पहाड़ी, हनुमान डूँगरी, गणेश डूँगरी इस सभ्यता से संबद्ध हैं।
- दयाराम साहनी के अनुसार हूण शासक मिहिरकुल ने बैराठ सभ्यता को ध्वस्त कर दिया था।
- चीनी यात्री ह्वेनसांग (युवान-चांग) ने बैराठ की यात्रा की थी और इसे "यात्रियों के राजकुमार" के रूप में जाना गया।
- बैराठ के बीजक डूँगरी से प्राप्त भाब्रू शिलालेख की खोज कैप्टन बर्ट (1837) ने की थी (वर्तमान में एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल में सुरक्षित)। इस अभिलेख में बुद्ध, धम्म, संघ का उल्लेख है।
- बैराठ से गौतम बुद्ध की अस्थियों से भरी स्वर्ण मंजूषा सवाई रामसिंह के समय मिली। यहाँ भारत में सर्वप्रथम मंदिर के अवशेष (गोल मंदिर) और अशोक स्तंभ के अवशेष मिले हैं।
🔍 बैराठ से प्राप्त प्रमुख अवशेष:
• 6-7 कमरों का खण्डहरनुमा भवन, शंखलिपि के प्रमाण
• चाँदी की आठ पंचमार्क (आहत) मुद्राएँ
• यूनानी शासकों की 28 मुद्राएँ (जिनमें 16 मुद्राएँ यूनानी शासक मिनेण्डर की हैं)
• मिट्टी से बने पूजा पात्र, थालियाँ, लोटे, मटके, खप्पर, आठ बौद्ध मठ व स्तूप
• हाथ से बने सूती कपड़े में बंधी 36 चाँदी की मुद्राएँ, चित्रित शैलाश्रय (लाल रंग के शैल चित्र)
🏛️ 4. गणेश्वर सभ्यता (नीम का थाना, सीकर)
नदी: कांतली नदी (तोरावटी बेसिन)
खोज: रतनचन्द्र अग्रवाल (1972)
उत्खनन: आर.सी. अग्रवाल, विजय कुमार (1977-78)
उपनाम: ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी, पुरातत्व का पुष्कर, ताम्र संचयी संस्कृति
विकास काल: लगभग 2800 ई.पू.
📌 महत्वपूर्ण विशेष तथ्य:
- राजस्थान का एकमात्र स्थल जहाँ से पत्थर के बाँध मिले हैं (बाढ़ नियंत्रण व जल संरक्षण हेतु)।
- यहाँ से ताँबे के बाणाग्र, मछली पकड़ने के कांटे, कपिशवर्ण मृद्भाण्ड व लगभग 2000 ताम्र आयुध मिले हैं, जिसमें 99% शुद्ध ताँबा शामिल है।
- यहाँ से ताँबा हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसी महान सभ्यताओं को भी भेजा जाता था। यहाँ मकान व बाँध पत्थर के बनाए जाते थे।
📍 बागौर सभ्यता (भीलवाड़ा)
- नदी: कोठारी नदी तट | खोज/उत्खनन: डॉ. वीरेंद्र नाथ मिश्र (1967-68), एल.एस. लेशानिक
- उपनाम: आदिम संस्कृति का संग्रहालय / महासतियों का टीला।
- यह भारत का सबसे बड़ा मध्यपाषाण कालीन स्थल है।
- यहाँ से भारत में पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य मिले हैं। यहाँ से माइक्रोलिथ (लघु पाषाण उपकरण), कंकाल के गले में पत्थर/हड्डियों का हार तथा तांबे के उपकरण मिले हैं।
📍 बालाथल सभ्यता (उदयपुर)
- स्थान: वल्लभनगर (उदयपुर) | नदी: बेड़च नदी
- उत्खनन: 1993-2000 में वी.एन. मिश्र, आर.एन. मोहेते, ललित पाण्डें द्वारा।
- यह एक ताम्रपाषाणिक स्थल है जहाँ 11 कमरों का एक बड़ा दुर्गनुमा भवन मिला है।
- यहाँ से लोहे को गलाने की 5 भट्टियाँ, तांबे के आभूषण, मिट्टी के बर्तन तथा हाथ से बुने कपड़े के प्राचीनतम अवशेष प्राप्त हुए हैं।
🌟 अन्य प्रमुख पुरातात्विक स्थल (One-Liners & Facts)
रैड़ (निवाई, टोंक): ढील नदी के तट पर। केदारनाथ पुरी (1938-40). यहाँ लौह सामग्री का विशाल भंडार मिलने के कारण इसे 'भारत का प्राचीन टाटानगर' कहते हैं। यहाँ से 3075 आहत मुद्राएँ तथा अपोलो डॉटस का सिक्का मिला है।
रंगमहल (हनुमानगढ़): सरस्वती नदी के पास। 1952-53 में डॉ. हन्नारिड (स्वीडन) द्वारा उत्खनन। कुषाणकालीन सभ्यता। 105 तांबे की मुद्राएँ तथा चावल की खेती के साक्ष्य मिले।
नोह (भरतपुर): रूपारेल नदी के किनारे। 5 सांस्कृतिक युगों के अवशेष। यहाँ से जाखबाधा प्रतिमा (यक्ष की पाषाण प्रतिमा) प्राप्त हुई है। यहाँ से लोहे के प्रयोग के प्राचीन प्रमाण मिले हैं।
सुनारी (खेतड़ी, झुंझुनू): यहाँ से लोहा बनाने की प्राचीनतम भट्टियाँ और धोकनी प्रयुक्त धमन भट्टी के अवशेष मिले हैं। लोग चावल का प्रयोग करते थे।
नगरी (चित्तौड़गढ़): प्राचीन नाम माध्यमिका (पाणिनि की अष्टाध्यायी व पतंजलि के महाभाष्य में उल्लेख)। डॉ. डी.आर. भंडारकर व 1962 में उत्खनन। यहाँ शिव जनपद के सिक्के मिले हैं।
जोधपुरा (कोटपूतली-बहरोड़): साबी नदी के किनारे। पाँच स्तरों पर उत्खनन। शुंग एवं कुषाण कालीन अवशेष व लौह भट्ठियाँ मिली हैं।
भीनमाल (जालौर): उत्खनन रतनचन्द्र अग्रवाल (1953-54)। यहाँ से एक रोमन ऐम्फोरा (सुरापात्र) व यूनानी सुराही मिली है, जो विदेशी व्यापार की पुष्टि करती है।
तिलवाड़ा (बालोतरा): लूणी नदी के किनारे मध्य पाषाण कालीन स्थल। पशुपालन एवं आखेट के साक्ष्य मिले हैं।
📊 राजस्थान के प्रमुख पुरातात्विक स्थल, कालक्रम एवं उपकरण (Table)
| क्र.सं. | संस्कृति / काल | प्रमुख स्थल | औजार व उपकरण | जीवन शैली / विशेषताएँ |
|---|---|---|---|---|
| 1. | पुरापाषाण काल | दीदवाणा, जायल (नागौर), भानगढ़ (अलवर), विराटनगर, दर (भरतपुर), इन्द्रगढ़ (बूंदी) | हैण्डएक्स (कुल्हाड़ी), क्लीवर, चापर चौपिंग, स्क्रैपर, प्वाइंट | यायावर जीवन, आखेटक, खाद्य संग्रहक, आग से परिचय |
| 2. | मध्यपाषाण काल | बागौर (भीलवाड़ा), तिलवाड़ा (बालोतरा), विराटनगर, सो जात (पाली), धनेरी | माइक्रोलिथ (लघु पाषाण उपकरण), सेल्ट, वसुला | पशुपालक, आखेटक एवं खाद्य संग्रहक (मेसोलिथिक संस्कृति) |
| 3. | नवपाषाण काल | आहाड़ (उदयपुर), गिलूंड (राजसमंद), कालीबंगा (हनुमानगढ़) | कुल्हाड़ी, पॉलिशदार पाषाण उपकरण | बस्ती में स्थायी जीवन, पहिए का आविष्कार (चाक निर्माण) |
| 4. | ताम्रपाषाण काल / ताम्रयुगीन | गणेश्वर (सीकर), आहाड़, बागौर, बालाथल, बैराठ, ओझियाना, कुराड़ा, बुढ़ा पुष्कर | ताम्र उपकरण (बाणाग्र, चूड़ियाँ, कुल्हाड़ियाँ), मृद्भाण्ड | कृषि कार्य, खाद्य उत्पादक, मृद्भाण्ड कला व तांबे से परिचय, स्थायी जीवन |
| 5. | लौहयुगीन काल | नोह (भरतपुर), विराटनगर, जोधपुरपुरा, सुनारी, रैड़, नगर, भीनमाल, नगरी, सांवर | लौह उपकरण, भट्टियाँ, हथियार व विविध सामग्री | स्थायी जीवन, कृषि और पशुपालन, शिल्प एवं व्यापार का विकास |
🏷️ राजस्थान की सभ्यताओं के प्रमुख उपनाम (Quick Revision)
1. भारत का टाटानगर: रैड़ (टोंक)
2. कालीबंगा प्रथम: सुँथी (बीकानेर)
3. ताम्रवती नगरी: आहाड़ (उदयपुर)
4. ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी: गणेश्वर (सीकर)
5. आदिम साहित्य का संग्रहालय: बागौर (भीलवाड़ा)
6. दीन-हीन बस्ती: कालीबंगा (हनुमानगढ़)
7. मृतकों के टीलों की सभ्यता: आहाड़ (उदयपुर)
8. पुरातत्व का पुष्कर: गणेश्वर (सीकर)
9. औजारों की नगरी: कुराड़ा (दीदवाणा-कुचामन)
10. प्राचीन युग की चित्रशाला: बैराठ (कोटपूतली-बहरोड़)
11. धूलकोट सभ्यता: आहाड़ (उदयपुर)