राजस्थान की प्राचीन सभ्यता और अभिलेख

 

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#1. निम्नलिखित में से किस पुरास्थल की पहचान पुरातत्त्वविद् टी. एच. हैण्डले ने एक बौद्ध कस्बे के रूप में की थी ? (RAS Pre-2025)

1. नलियासर (सही विकल्प) के बारे में नोट्स:

  • जयपुर: यह पुरास्थल वर्तमान जयपुर जिले (सांभर क्षेत्र) में स्थित है।

  • लौहयुगीन: यह एक लौह युगीन (Iron Age) सभ्यता का स्थल है।

  • 105 कुषाण कालीन मुद्राएं: यहाँ उत्खनन में कुषाण वंश के शासकों (विशेषकर हुविष्क) के समय के 105 तांबे के सिक्के (मुद्राएं) प्राप्त हुए हैं।

2. अन्य विकल्पों के बारे में नोट्स:

  • विकल्प (2) बूढ़ा पुष्कर:  यह ‘Ajmer’ (अजमेर) में स्थित है और यह एक ‘पुरापाषाण’ (Paleolithic) कालीन पुरातात्विक स्थल है।

  • विकल्प (3) बैराठ:  ‘बौद्ध मठ’। बैराठ (विराटनगर, कोटपूतली-बहरोड़/जयपुर) राजस्थान में बौद्ध धर्म का एक प्रमुख केंद्र था, जहाँ से गोल बौद्ध मंदिर (मठ) और अशोक के शिलालेख मिले हैं।

#2. कालीबंगा सभ्यता के संदर्भ में सबसे असत्य कथन का चयन करें। (CET 12th-2024)

व्याख्या: यह कथन इतिहास के अनुसार बिल्कुल गलत है, और इसीलिए यही आपका सही उत्तर है। वास्तव में, कालीबंगा पूरे विश्व में जुते हुए खेत (Ploughed field) के सबसे प्राचीन प्रमाण मिलने के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ पर आड़ी-तिरछी (Grid pattern) जुताई के साक्ष्य मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि यहाँ एक साथ दो फसलें (जैसे चना और सरसों) उगाई जाती थीं।

#3. अनाज रखने के बडे मृदभाण्ड जिन्हें “गोरे कोठ” कहा जाता था, किस प्राचीन सभ्यता से प्राप्त हुए ?

सही उत्तर – आहड़

व्याख्या – आहड सभ्यता उदयपुर जिले में आहड़ / बेडच नदी के किनारे स्थित है, इसका प्राचीन नाम आघाटपुर था

#4. कौन सी सभ्यता धूलकोट या ताम्रवती नगरी के नाम से प्रसिद्ध है? [CET 12th – 2024]

#5. निम्नलिखित में से किस शिलालेख से मौर्यों का राजस्थान से सम्बन्ध ज्ञात होता है-

सही उत्तर – कणसव शिलालेख

व्याख्या – यह शिलालेख 738 ई में कोटा से प्राप्त हुआ जिसमें धवल नामक मौर्य राजा का नाम मिलता है



#6. दो मुँह का चूल्हा व बहुत प्रकार के बर्तनों के साथ सिलबट्टा व पैन निम्नलिखित में से किस स्थान से खुदाई में मिले थे ?

सही उत्तर – आहड़

व्याख्या – यंहा से काले व लाल मृदभांड (मिटटी के बर्तन) मिले जिन्हें गोरे / कोठ कहा जाता था

#7. राजस्थान का सबसे प्राचीन शिलालेख है?

सही उत्तर – बड़ली का शिलालेख

व्याख्या – यह शिलालेख बारा जिले से मिला जिसमें मोखरी वंश के राजाओ का वर्णन मिलता है

#8. एक अभिलेख में नागभट्ट के एक सामन्त शंकर गण का मुंगेर युद्ध में भाग लेने का वर्णन है। यह अभिलेख है-

सही उत्तर – चाकसू का

व्याख्या – चाकसू जयपुर में स्थित प्रशस्ति 813 ई. की है

#9. भोज परमार के शासनकाल में प्रबंध चिन्तामणि ग्रंथ किसके द्वारा लिखा-

सही उत्तर – मेरूतुंग ने

व्याख्या – मेरुतुंग 14वीं शताब्दी के एक भारतीय लेखक थे। उन्होंने संवत 1361 में प्रबन्धचिन्तामणि नामक ग्रन्थ की रचना की।

#10. निम्नलिखित में से कौनसा काल कालीबंगा सभ्यता से सम्बन्धित हैं ?

सही उत्तर – 2500 ई.पू. से 1500 ई.पू.

व्याख्या – घग्घर नदी के किनारे हनुमानगढ़ जिले में स्थित कालीबंगा का अर्थ काली चूड़िया होता है 1952 में अमलानंद घोष ने इसकी खोज करी तथा उत्खंनन कार्य बी.बी लाल व बी. के. थापर ने किया



#11. किस राजस्थानी ग्रंथ में अलाउद्दीन खिलजी की जालौर विजय का विवरण मिलता है-

सही उत्तर – कान्हड़दे प्रबंध

व्याख्या – कान्हड़दे प्रबन्ध पश्चिमी अपभ्रंश में रचित एक ग्रन्थ है जिसकी रचना कवि पद्मनाभ ने सन 1455 में की थी।

#12. गणेश्वर – जोधपुरा कॉपर कॉम्पलेक्स निम्नलिखित में से किस-किस मृद्भांड से सम्बंधित है? (Agriculture Officer-2025)

यह राजस्थान की एक अत्यंत महत्वपूर्ण ताम्रपाषाण युगीन (Chalcolithic) सभ्यता है, जो मुख्य रूप से दो पुरातात्विक स्थलों से मिलकर बनती है:

  1. गणेश्वर: यह स्थल कांतली नदी के उद्गम पर स्थित है (पूर्व में सीकर जिला, वर्तमान में नीम का थाना जिला)। इसे “भारत में ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी” भी कहा जाता है। यहाँ से 99% शुद्ध तांबे के उपकरण मिले हैं।

  2. जोधपुरा: यह स्थल साबी नदी के तट पर स्थित है (पूर्व में जयपुर जिला, वर्तमान में कोटपूतली-बहरोड़ जिला)। विशेष ध्यान दें: यह जोधपुर शहर नहीं है।

इन दोनों स्थलों से भारी मात्रा में तांबे के आयुध और उपकरण (जैसे मछली पकड़ने के कांटे, कुल्हाड़ियाँ, तीर के अग्रभाग) मिले हैं। यहाँ से सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा और मोहनजोदड़ो) को भी तांबे का निर्यात किया जाता था, इसी कारण पुरातात्विक भाषा में इसे एक संयुक्त ‘कॉपर कॉम्प्लेक्स’ कहा जाता है।

मृद्भांड (Pottery) का संबंध

पुरातत्व में किसी भी सभ्यता की पहचान उसके मिट्टी के बर्तनों (मृद्भांडों) की बनावट और रंग से की जाती है।

  • गेरुए रंग के मृद्भांड (OCP): गणेश्वर-जोधपुरा क्षेत्र में खुदाई के दौरान जो मिट्टी के बर्तन मिले हैं, वे मुख्य रूप से गेरुए या गैरिक रंग (Ochre colour) के हैं।

  • इन बर्तनों को इतिहासकार ‘कपिषवर्णी मृद्भांड’ भी कहते हैं। इन पर काले रंग और सफेद रंग की चित्रकारी (उकेरे गए डिजाइन) भी देखने को मिलती है। इसी विशिष्टता के कारण इस ताम्र संकुल को गेरुए रंग के मृद्भांड संस्कृति के अंतर्गत रखा जाता है।

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