राजस्थान में 1857 की क्रांति से महत्वपूर्ण प्रश्न 4

Rajasthan 1857 revolt exam questions in Hindi

 

Results

#1. किस ब्रिटिश अधिकारी ने 1857 में कोटा में क्रांतिकारियों का दमन किया-[Archivist-03.08.2024]

कोटा में लगभग 6 महीने (अक्टूबर 1857 से मार्च 1858) तक क्रांतिकारियों का जनता पर शासन रहा।

कोटा को क्रांतिकारियों से मुक्त कराने और विद्रोह का दमन करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने मेजर जनरल एच.जी. रॉबर्ट्स (General Roberts) के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी।

30 मार्च 1858 को जनरल रॉबर्ट्स की सेना ने करौली के शासक मदनपाल की सैन्य सहायता से कोटा पर आक्रमण किया और क्रांतिकारियों को हराकर कोटा दुर्ग और शहर पर पुनः नियंत्रण प्राप्त किया।

Options ki Jankari:

  • लेफ्टिनेंट हीथकोट: ये मारवाड़ के ‘बिठौड़ा के युद्ध’ (8 सितंबर 1857) में जोधपुर की राजकीय सेना के साथ क्रांतिकारियों के खिलाफ लड़े थे।

  • ब्रिगेडियर होम्स (कर्नल होम्स): इन्होंने आउवा (पाली) के विद्रोह का दमन किया था।

  • कर्नल एबॉट: ये नीमच छावनी के अंग्रेज अधिकारी थे।

#2. 1857 की क्रांति के समय कोटा में प्रमुख नेता जयदयाल तथा मेहराब खाँ क्रमशः कहाँ के निवासी थे- [JEN (विद्युत) डिप्लोमा -29.11.2020]

  • लाला जयदयाल: ये मथुरा (उत्तर प्रदेश) के निवासी थे और कोटा दरबार में वकील (एडवोकेट) के पद पर कार्यरत थे।

  • मेहराब खान: ये करौली के निवासी थे और कोटा राज्य की सेना में ‘रिसालदार’ (सैनिक अधिकारी) थे। इन दोनों को बाद में अंग्रेजों द्वारा कोटा में ही एजेंसी के पास नीम के पेड़ पर सरेआम फाँसी दे दी गई थी।

#3. 1857 ई. के विप्लव के समय नीमच में अंग्रेज सैनिक अधिकारी कौन था? [II Grade (S-II) -29.1.2023]

1857 की क्रांति के समय नीमच छावनी (जो वर्तमान में मध्य प्रदेश में है लेकिन तब मेवाड़ के अंतर्गत आती थी) में अंग्रेज सैनिक अधिकारी कर्नल एबॉट (Colonel Abbot) था।

जब नसीराबाद में विद्रोह की खबर नीमच पहुँची, तो कर्नल एबॉट ने 2 जून 1857 को छावनी के भारतीय सैनिकों को गंगा, कुरान और तलवार की कसमें खिलाकर ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार रहने की शपथ दिलाई थी।

इस पर क्रांतिकारी सैनिक मोहम्मद अली बेग ने अंग्रेजों की वफादारी पर सवाल उठाते हुए चुनौती दी थी।

#4. नीमच छावनी से विद्रोही सैनिक दिल्ली जाते समय किस छावनी में पहुँचे? [R.A.S. Pre Exam, 1992]

नीमच से विद्रोह कर दिल्ली की ओर बढ़ रहे सैनिक रास्ते में टोंक की ‘देवली छावनी’ पहुँचे थे। उन्होंने देवली छावनी को लूटा और वहाँ के सैनिकों को भी अपने साथ क्रांति में शामिल कर लिया।

Options ki Jankari:

  • निम्बाहेड़ा: सैनिक यहाँ से गुजरे जरूर थे और स्थानीय जनता ने उनका स्वागत किया था, लेकिन निम्बाहेड़ा कोई ‘सैनिक छावनी’ (Cantonment) नहीं थी।

  • कोटा: कोटा में विद्रोह काफी बाद में (अक्टूबर में) हुआ था, विद्रोही सैनिक इस रास्ते से दिल्ली नहीं गए थे।

  • नसीराबाद: यह अजमेर में स्थित थी और यहाँ के सैनिक अलग मार्ग से दिल्ली गए थे।

#5. ”अंग्रेजों ने अपनी शपथ भंग की है। क्या उन्होंने अवध पर अधिकार नहीं किया? अतः उन्हें यह अपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि भारतीय अपनी शपथ का अनुपालन करेंगे।” 1857 की क्रांति के संदर्भ में यह कथन किसने कहा था- [पटवार मुख्य -2016]

यह प्रसिद्ध कथन नीमच छावनी के सैनिक मोहम्मद अली बेग का है। उसने कर्नल एबॉट को अवध विलय की याद दिलाते हुए अंग्रेजों की वफादारी की शपथ लेने से इनकार कर दिया था।



#6. 1857 विद्रोह के समय जोधपुर के महाराजा तखतसिंह ने किसके नेतृत्व में सेना अजमेर भेजी- [कनिष्ठ वैज्ञानिक सहायक (अस्तवेध) 21.9.2019]

1857 की क्रांति के समय अजमेर अंग्रेजों का मुख्य केंद्र (शस्त्रागार/खजाना) था। जब नसीराबाद में क्रांति भड़की, तो अजमेर की सुरक्षा के लिए अंग्रेजों ने जोधपुर (मारवाड़) के महाराजा तखत सिंह से मदद माँगी।

महाराजा तखत सिंह ने अपने सेनापति (किलेदार) कुशल राज सिंघवी (Kushal Raj Singhvi) के नेतृत्व में एक सेना अजमेर की सुरक्षा के लिए भेजी थी।

#7. निम्नलिखित में से 1857 ई. की क्रांति में कौनसे युद्ध में जोधपुर का पॉलिटिकल एजेंट मैसन मारा गया था? [II Grade GK – 21.12.2022]

18 सितंबर 1857 को हुए ‘चेलावास के युद्ध’ (काले-गोरों के युद्ध) में क्रांतिकारियों ने जोधपुर के पॉलिटिकल एजेंट मॉक मैसन की हत्या कर दी थी।

#8. कुशलसिंह की पराजय के बाद ब्रिटिश सेना ने आउवा पर कब्जा किया-[Librarian Gr.-III – 13.11.2016]

20 जनवरी 1858 को कर्नल होम्स ने आउवा पर आक्रमण कर दिया। जब किले का पतन निश्चित हो गया, तो ठाकुर कुशाल सिंह किले की रक्षा का भार अपने छोटे भाई पृथ्वी सिंह को सौंपकर मेवाड़ की ओर निकल गए।

इसके बाद 24 जनवरी 1858 को ब्रिटिश सेना ने आउवा के किले पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया।

#9. स्थान जहां आउवा के ठाकुर कुशालसिंह ने अपना अंतिम समय व्यतीत किया वह था- [School Lecturer (Sanskrit Edu.)-04.08.2020]

विद्रोह की जाँच के लिए अंग्रेजों ने ‘टेलर आयोग’ (Taylor Commission) का गठन किया। साक्ष्यों के अभाव में इस आयोग ने कुशाल सिंह को निर्दोष बरी कर दिया। रिहा होने के बाद ठाकुर कुशाल सिंह ने अपना शेष (अंतिम) जीवन उदयपुर (मेवाड़) में शांतिपूर्वक व्यतीत किया, जहाँ 1864 ई. में उनका निधन हो गया।

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